Friday, November 28, 2025

मरने से पहले...


कुछ तो समेट लूँ पंक्तियों में, अल्फ़ाज़ बिखरने से पहले,
क्या दो-चार पल जी लूँ मैं भी, यूँ मरने से पहले।
मेरी रूह काँप उठती है, तेरा किसी और का सोचते ही,
क्या उसके कदम ना डगमगाए होंगे, दगा करने से पहले।

अब किससे कहूँ — ये ज़ख़्म रफ़ू कर दे लफ़्ज़ों से,
मैं दर्द की हर हद छू लेना चाहता हूँ, गुज़रने से पहले।
अब साँसों में भी उतरने लगा है धीरे-धीरे ज़हर,
मैं खुद को समेट लेना चाहता हूँ, फिर बिखरने से पहले।

तुम मानो या ना मानो मेरी हाल-ए-दिल की दास्ताँ,
मैं सब कह देना चाहता हूँ, भीतर सन्नाटा भरने से पहले।
एक रोज़ तुम भी तड़पोगे किसी अज़ीज़ की ख़ातिर,
तब समझोगे — क्या होता है, रोज़ मरना मरने से पहले।

आज हर ख़ता मेरी ही नज़र आती होगी तुम्हें,
कभी मेरा हाल भी देखा था, यूँ सँवरने से पहले?
ये बिखरे ख़्वाब, ये तल्ख़ लहजा — सब तेरी इनायत है,
मेरा दिल भी साफ़ था कभी, तेरे दिल में ठहरने से पहले।

अब और लिखूँगा तो कलम भी रो पड़ेगी हालात पर,
तेरा एक आँसू ना गिरा — मेरी खुशियाँ हरने से पहले।
दो-चार दिन और दिखूँगा शायद तेरे मोहल्ले में,
मैं बस जी भर के देखना चाहता हूँ तुझे — बिछड़ने से पहले।








Saturday, November 15, 2025

“रघुवंश की मर्यादा की कथा”



अयोध्या की धूल में छिपा स्वर्णिम गौरव काल,
हर कण में गूँजता इक्ष्वाकु का प्रतिपाल।
मंत्रों की धार तले जला मर्यादा का दीप,
जहाँ सत्य था राज्य, और धर्म था संगीत।

सगर की तपस्या ने नभ को किया प्रकाशमान,
भगीरथ के मौन में बहा गंगा का उफान।
दशरथ हुए प्रहरी सत्य और धर्म के,
रघुवंश चमका जैसे सूरज के कर्म से।

रघुकुल का तेज था किरणों का आलोक,
वचन के आगे जीवन था उनका संयोग।
वहीं से जन्मे राम — मर्यादा के पर्याय,
धर्म की मशाल बने, स्नेह के स्वर्णिम अध्याय।

है वेदों की वाणी में गूँजते उनके नाम,
पुरखों की तप में बसता आत्मा का धाम।
सगर का बल, भगीरथ की विनम्र आराधना,
हर राजा में झलकी उनकी ही साधना।

जब त्रेता में अधर्म का जाल फैला चहुँओर,
धरती पुकार उठी — “हे विष्णु! अब धरो भोर।”
अवध में जन्मे राम — करुणा के सागर,
सत्य का परचम थामे, हर तम को किया निराधार।

जनकपुरी की माटी ने सीता का रूप सँवारा,
धरती की पुत्री थी — धैर्य का उजियारा।
वनपथ की धूल में भी इतिहास चला,
जहाँ प्रेम और त्याग का दीप पुनः जला।

राम में था दशरथ का संयम महान,
सगर का साहस, भगीरथ का ध्यान।
जनक का वैराग्य, विश्व का उपदेश,
मर्यादा में बँधा था परमात्मा का भेष।

आज भी जब कोई सत्य के लिए लड़े,
अधर्म के विरुद्ध अडिगता से रहे खड़े।
तो लगता है — त्रेता फिर लौट आई है,
राम की मर्यादा फिर जगमगाई है

जय श्रीराम 🙏


Sunday, November 2, 2025

मन मार रहा हूँ मैं



ऐसा भी नहीं कि हार रहा हूँ मैं,

मगर धीरे-धीरे ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं।

बहुत कुछ देख लिया इन चार दिनों की उम्र में,

लगता है पिछले जन्मों का गुनाह उतार रहा हूँ मैं।


कितने ख्वाब, कितनी ख्वाहिशें समेटे था मन,

मगर अब बैरागी बन वक़्त गुज़ार रहा हूँ मैं।

किससे कहूँ — लौटा दे वो पुराने दिन,

जिनके लिए अब रोज़ बचपन को पुकार रहा हूँ मैं।

अब मन से भी चीज़ें बेमन सी हो जाती हैं,

बस पग गिन-गिन कर सफ़र कर पार रहा हूँ मैं।

इतना ऊब गया हूँ अब ज़िंदगी के ऊहापोह से,

शांति की ख़ातिर ख़ुद को न्यौछार रहा हूँ मैं।


बहुत किया प्रयत्न, पर परिणाम हमेशा खिलाफ ही रहा,

समझ नहीं आता कौन-सा कर्ज़ तार रहा हूँ मैं।

कुछ तो मैंने भी झेला होगा बहुत बोझिल मन से,

ऐसे ही नहीं, ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं। 🙏