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Friday, November 28, 2025

मरने से पहले...


कुछ तो समेट लूँ पंक्तियों में, अल्फ़ाज़ बिखरने से पहले,
क्या दो-चार पल जी लूँ मैं भी, यूँ मरने से पहले।
मेरी रूह काँप उठती है, तेरा किसी और का सोचते ही,
क्या उसके कदम ना डगमगाए होंगे, दगा करने से पहले।

अब किससे कहूँ — ये ज़ख़्म रफ़ू कर दे लफ़्ज़ों से,
मैं दर्द की हर हद छू लेना चाहता हूँ, गुज़रने से पहले।
अब साँसों में भी उतरने लगा है धीरे-धीरे ज़हर,
मैं खुद को समेट लेना चाहता हूँ, फिर बिखरने से पहले।

तुम मानो या ना मानो मेरी हाल-ए-दिल की दास्ताँ,
मैं सब कह देना चाहता हूँ, भीतर सन्नाटा भरने से पहले।
एक रोज़ तुम भी तड़पोगे किसी अज़ीज़ की ख़ातिर,
तब समझोगे — क्या होता है, रोज़ मरना मरने से पहले।

आज हर ख़ता मेरी ही नज़र आती होगी तुम्हें,
कभी मेरा हाल भी देखा था, यूँ सँवरने से पहले?
ये बिखरे ख़्वाब, ये तल्ख़ लहजा — सब तेरी इनायत है,
मेरा दिल भी साफ़ था कभी, तेरे दिल में ठहरने से पहले।

अब और लिखूँगा तो कलम भी रो पड़ेगी हालात पर,
तेरा एक आँसू ना गिरा — मेरी खुशियाँ हरने से पहले।
दो-चार दिन और दिखूँगा शायद तेरे मोहल्ले में,
मैं बस जी भर के देखना चाहता हूँ तुझे — बिछड़ने से पहले।








Friday, July 11, 2025

अति ऐतबार...


अति ऐतबार भी रिश्तों को अक्सर डुबा देता है,
लगी हो आग ज़िंदगी में तो पत्ता-पत्ता हवा देता है।

लिहाज़ करते-करते रिश्ते में बेहिसाब लुटे हम,
ज़ख्म नासूर हो जाए तो मरहम भी सज़ा देता है।

फिर ख़्याल आया ख़्वाहिशों में रहने वाले शख़्स का,
साथ ही याद आया तिरस्कार उसके हवाले का।

हमें तो जूठन भी लज़ीज़ लगा करती थी उसकी,
ले लिया हिसाब उसने एक-एक निवाले का।

पाया था जिसे हमने अपना सब कुछ गँवाकर,
वही बैठा है आज हमसे किनारा करके।

जिसके बिछड़ने का तसव्वुर भी बिखेर देता था हमें,
चल दिया वो आज हमें बिल्कुल बेसहारा करके।

डूबना ही अगर मुकद्दर है तो डुबा ले ऐ पानी,
हम तो चुल्लू में डूबने वालों में हुए हैं नामी।

उसकी निगाहें ही काफ़ी थीं हमें तबाह करने को,
फिर क्या ज़रूरत थी झूठ की सुनामी लाने को।

वफ़ा की राह में हम उम्र भर बिछते रहे मगर,
वो मशगूल रहा हर मोड़ पर बहाने बनाने को।

अब शिकवा भी क्या करें उस बेवफ़ा ज़माने से,
लोग छोड़ देते हैं अपनों को भी ठिकाने लगाने को।