Tuesday, April 6, 2021

दो गज दूरी....

हक मे हवायें चल नहीं रहीं 
प्रकृति भी रुख रही बदल 
फैल रहा रिपु अंजान अनिल संग 
घर से तू ना बाहर निकल 

कर पालन हर मापदंड का
जिसे सरकारों ने किया है तय 
बना लो दूरियां दरमियाँ कुछ दिन 
पास आने से संक्रमण का है भय 

पहनो मास्क रखो सफाई भी 
हाथों को भी नित तुम साफ़ करो
Sanitizer का करके इस्तेमाल
संदेह और भय का त्याग करो 

अपना और अपनों का जीवन
जिद्द मे आकर ना क्षय करो
एकांत या देहांत तुम्हें क्या चाहिए 
ये खुद तुम ही अब तय करो

करके अपने ज़ज्बात पे काबू 
रख दो दो गज की दूरी 
अगर बचना है इस महामारी से 
तो मास्क पहनना है जरूरी |
                              (हैरी) 

Tuesday, March 23, 2021

"अमर सपूत"


ऐ धरती के अमर सपूत
तुझ बिन आँखे पथराई हैं
मातृभूमि पे तू हुआ निसार
असहनीय तेरी जुदाई है

परमवीर और अदम्य साहसी
तू सच्चा मातृभूमि का रखवाला था
माना जननी जन्मभूमि है सबसे पहले 
नौ माह मैंने भी तुझे पाला था

एक माँ की रक्षा के खातिर
एक माँ का सूना संसार किया
लौट आया तिरंगे मे लिपटकर 
शोकाकुल अपना घर बार किया

एक वो दिन था जब आस सदा
आने की तेरी रहती थी
मिल के फिर तुझको सहलाऊँगी
इस आस मे दूरी सहती थी

अब गया तू ऐसे छोड़ मुझे
शायद कभी ना मिल पाऊँगी 
कल तक मेरा "बेटा" था तू 
अब "माँ" मैं तेरी कहलाऊँगी 

पहचान मुझे दे गया नई 
तू होकर अमर इतिहास मे 
धन्य मेरी कर गया कोख को 
सदा अमर रहेगा तू जनमानस के एहसास मे |
                                             *जय हिंद*
           

Sunday, March 21, 2021

*ऐसा मेरा पहाड़ है*


चिड़ियों की चहचहाहट, कहीं भँवरों की गुंजन,
कहीं कस्तूरी हिरण, तो कहीं बाघों की दहाड़ है।
हाँ, ऐसा मेरा पहाड़ है।
खेतों में लहराती हरियाली, कहीं नदियों की रवानी,
मंजुल झरनों से आती शीतल-शीतल फुहार है।
हाँ, ऐसा मेरा पहाड़ है।
ग्वालों की मीठी बंसी, कहीं बकरियों की अठखेली,
महकती फूलों की घाटी, औषधियों की बयार है।
हाँ, ऐसा मेरा पहाड़ है।
सुबह सुनहरी धूप, कहीं साँझ की शांत चादर,
देवदारों की खुशबू से महका हर द्वार है।
हाँ, ऐसा मेरा पहाड़ है।
बर्फीले हिमालय, कहीं मखमली से बुग्याल,
परियों का वास, कहीं देवों का सत्कार है।
हाँ, ऐसा मेरा पहाड़ है।
ढोल-दमाऊँ की थापें, कहीं लोकगीतों की सरगम,
रंगीली संस्कृति पर हर दिल यूँ निसार है।
हाँ, ऐसा मेरा पहाड़ है।
गंगा का उद्गम यहीं, कहीं बद्री-केदार की महिमा,
हर की पौड़ी की आस्था, यहीं हरिद्वार है।
हाँ, ऐसा मेरा पहाड़ है।