Sunday, April 30, 2023

धरती माँ की पुकार...

 


यह धरा हमारी भू-जननी,
जहाँ हमने नश्वर जीवन पाया है,
जिसका अमृत-सा जल पिया,
प्राणों का अन्न भी खाया है।
सदियों पुराना इतिहास जिसका,
भिन्न उत्पत्तियों की कहानी है,
नष्ट हो रही जो मनु-कृत्यों से,
इसको हमने बचानी है।
धरती माँ के वृक्ष काट रहे,
बारूदी बल पर धरा बाँट रहे,
सूख रहे जलप्रपात भू-मंडल के,
सूख रहा सब पानी है।
कहीं करो जल-संरक्षण,
कहीं करो वृक्षारोपण,
फिर नवजीवन धरा पर लानी है।
जब धरा का जर्रा-जर्रा
हरियाली से गुलज़ार होगा,
कभी न सूखे की मार पड़ेगी,
हर पल बसंत बहार होगा।
रिमझिम मेघ बरसेगा अम्बर से,
मिट्टी की सोंधी खुशबू बयार होगी,
जब धरती पर खुशहाली होगी,
तब सुखी अपना संसार होगा।
जो बारूदी खेल आज
खेल रहा यह जहान है,
गगनभेदी मिसाइलों से
उठा रहा तूफ़ान है।
परिणाम से इसके अनभिज्ञ वह,
खुद को सोचता महान है,
धरती का सबसे बड़ा विनाशक
खुद आज बना इंसान है।
ओज़ोन परत में छिद्र हो रहा,
ग्लोबल वार्मिंग धरा को तपा रहा,
हर मौसम अब सर्प-दंश सा लगता,
हर साल नया कुछ दिखा रहा।
क्यों खेल रहे हो धरती से,
जिसने माँ बन सबको पाला है,
जाग जाओ, रोक लो खुद को,
वरना फिर प्रलय आने वाला है।
उठो, जागो धरती माँ के लाडलों,
फिर करना माँ का श्रृंगार है,
बहुत लिया है इस धरती से,
कुछ अर्पण करना ही संस्कार है।
आओ चमन में फिर फूल खिलाकर,
पवित्र विचारों का संचार करें,
फिर से गरिमामय करते हैं धरा को,
जिसकी यह हकदार है।
अस्तित्व संकट में जड़ मानव का,
हर संकेत यह बतला रहा,
खतरे के बादल मंडरा रहे हैं,
फिर भी न अफसोस जता रहा।
मत बन अचेत, मन में स्मरण कर,
क्यों दिन अपने घटा रहा,
कहीं पृथ्वी स्वयं शून्य में न समा जाए,
जागो, मैं तुमको जगा रहा।
जागो, मैं तुमको जगा रहा…




Tuesday, February 28, 2023

तेरी खामोशी, मेरा साज...



बिखरे अल्फ़ाज़ों की माला,
गढ़ना कभी आसान न था,
तेरे लबों की खामोशी को
पढ़ना कभी आसान न था।

फिर भी दिल की सुनी सदा,
भावनाओं को शब्दों में ढाला,
लफ़्ज़ों को पिरोया जब मैंने,
बन गई प्रीत की इक माला।

अब बस तुझ पर ही लिखना है,
तेरी ही आंखों को पढ़ना है,
तेरी खामोशी को लफ़्ज़ देना,
अपनी तन्हाई से लड़ना है।

लिखना है वो बिछड़ने का मंज़र,
लिखने हैं प्रेम के वो पल,
लिखनी है तेरी मेरी दास्तां,
हर वो मोड़, हर वो पहल।

जहाँ लिए थे वादे हमने,
कभी न होंगे एक-दूजे से दूर,
ज़िंदगी भर का साथ था माना,
उससे कम कुछ था न मंज़ूर।

तो फिर कैसे सब खत्म हुआ,
पल भर में बिखर गई बात,
एक बार तो आकर पूछ लो,
तेरे बिन कैसे हैं मेरे हालात।

अपने दर्द का घूंट अकेले पीता हूं,
तेरा साया आज भी मेरे दर से नहीं जाता,
तू भले ही दूर है अब मुझसे,
मगर मेरे भीतर से नहीं जाता।



Thursday, December 15, 2022

क्या करूँ इस सड़क का अब...?


अब सड़कों का जाल बिछाने 
लगे हुए हैं गाँव मे
जब लोग सारे करके पलायन 
जा चुके शहर, किराये के मकां मे 

जब जरूरत थी गाँव को 
मूलभूत सुविधाएं और रोड की 
तब ना दर्द का एहसास था किसी को 
ना फिक्र थी किसी की चोट की 

कैसे जननी जनती थी शिशु को 
नदी नाले और डोली मे 
कैसे वृद्ध ने हार कर तोड़ी सांसे 
कितना दुःख डाला गाँव की झोली मे 

मीलों पैदल चलकर माँ बहने 
पानी ढोकर लाती थीं 
करके खून पसीने का सौदा 
दो वक्त की रोटी खाती थी 

बच्चों ने जान हथेली मे रख कर 
थोड़ी बहुत शिक्षा पायी थी 
गहरी खाई और रपटते रास्तों मे 
बहुतों ने जान भी गंवाई थी 

अब बने है गाँव के हीतेसी 
जब लाखों गाँव उजड़ गए 
लाखों घर हो गए बंजर 
लाखों अपनों से बिछड़ गए 

अब उस सड़क के क्या मायने 
जिस पर चलने को लोग नहीं 
अब ना विरान मकां मे वो हलचल रहीं 
जिनका खुशियो से मिलन का संजोग नहीं 

आज भी शहर की चारदीवारी मे कैद 
बहुत अम्मा बाबा रोते हैं 
अपने गाँव के बाखली को याद करके 
बुढ़ी आंखे खुद को भीगोती हैं 

अब भी वक्त है कर दो जीर्णोद्धार 
कुछ रुके हुए हैं जो गाँव मे 
उस बुढ़े बरगद तक पहुंचा दो पानी 
हमारा बचपन गुजरा है जिसकी छांव मे