Wednesday, March 16, 2022

आखिर क्यों बिक रहा है पानी..


 दुनिया मे एक तिहाई  होकर भी 

बोतलों में क्यों बिक रहा पानी

क्यों  बैसाखी के भरोसे हैं दफ्तर,

 हताश निराश भटक रही है जवानी...


चश्मे का नंबर बढ़ा हुआ है 

घुटने का दर्द करता बयां कहानी 

पके बालों से चल रही सरकारें

बेरोजगार बैठीं है युवा जवानी


चंद मिनटों के काम में यहां

घंटों लगा देते हैं वृद्ध सेनानी

देश कछुओं के झुंड में फंसा  ...

खरगोश सी व्याकुल बैठी है जवानी


सत्ता भी उन से चल रहीं

जिनको परिवर्तन लगता है नादानी 

21 वीं सदी मे भी फंसे हैं लंगोट में 

जहां सूट बूट मे तैयार जवानी 


मैं ये नहीं कहता नाकाबिल है ये सब 

बस उम्र ने बढ़ायी है सब की परेशानी 

उचित सुविधा और सम्मान सेवानिवृत्त लें 

नव जोश लिए परिवर्तन को आतुर है जवानी 


बूढ़ा शेर भी असहाय हो जाता है 

फिर इंसान के बुढ़ापे पर कैसी हैरानी 

अपार भंडार है पर गुणवत्ता शून्य 

तभी इतना महँगा बिकने लगा है पानी।



Tuesday, March 8, 2022

स्त्री तेरी कहानी..


 

दामन मे है अश्क, भाग्य भी क्या खूब पाया है
जिसको समझा अपना, हर वो शख्स पराया है
विश्वास करूँ किस पर, किसको अपनी तकलीफ कहूँ
कब तक खामोश रहकर मैं, अपनों का हर दर्द सहूँ

हर युग मे ही दर्द सहा है, हर वक्त दुःख ही पाया है
बेटी होना अगर गुनाह है, फिर मुझे क्यूँ जन्माया है
कभी जली दहेज के लिए, कभी हालातों ने सताया है
आखिर मैंने ही क्यूँ जग मे, अश्क बहाने को जन्म पाया है

अब ना देना जीवन दोबारा प्रभु, अगर हालात ना बदल सको
या बदल दो दृष्टि समाज की, अगर ज़ज्बात ना बदल सको
एहसास करा इस जग को मेरा, मुझमे भी तेरा अंश है
मैं ही हूँ इस जग की जननी, मुझसे ही इसका वंश है

कुल का दीपक देकर जग को, कुलदीप मैंने जलाये हैं
फिर भी प्रत्युपकार मे इस जग से, सिर्फ आशु ही पाए हैं
माना दया की प्रतिबिंब भी मैं, धीरज का प्रतिरूप भी हूँ
करुणा के सागर लिए नयनों मे, सहनशीलता की स्वरूप भी हूँ

पर थक चुकी हूं रो रो कर, अब मैं भी हँसना चाहती हूं
खुली हवा मे चंद लम्हें, मैं भी साँस लेना चाहती हूं
कुछ सपने है मेरे भी, मैं उन्हें जीना चाहती हूं
मांग कर देख लिया जग से, अब कुछ छीन कर पाना चाहती हूँ

मैं काली, दुर्गा, झाँसी का रूप, ये याद दिलाना चाहती हूं
भूल चुका जिस नारी को जग, मैं उससे मिलाना चाहती हूं
लेटे जिसके चरणों मे 'शिव', उस नारी को जगाना चाहती हूं
मिला जो सीता सावित्री को, वो सम्मान पाना चाहती हूं
मैं वो सम्मान पाना चाहती हूँ.......


Friday, March 4, 2022

पढ़ा लिखा बेरोजगार...




खोने को कुछ नहीं,
पाने को पूरा आसमान पड़ा है,
एक व्याकुल, विचलित शख़्स
आज चौराहे पर खड़ा है।
दोहरी मनोदशा के घोड़े पर
सवार उसका हर विचार है,
वह कोई और नहीं साहिब,
एक पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

रातों को नींद गिरवी रखकर
जिसने सपनों को सींचा था,
उम्मीदों की फाइलों में
अपने कल को खींचा था,
आज वही अपनी ही आँखों में
एक अनकहा-सा भार है,
भँवर से तो निकल आया,
पर नौका अब भी मझधार है।

हाथों में डिग्रियों का पुलिंदा,
दिल में उम्मीदों की आग लिए,
दर-दर दस्तक देता फिरता,
हर दफ़्तर की चौखट नाप लिए,
देश का भविष्य कहे जाने वाला
आज खुद से शर्मसार है,
असहाय-सा खड़ा हुआ
एक पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

मंज़िल पाने को आतुर है,
पर अवसर कोसों दूर खड़े,
जो कल तक घर का गौरव था,
आज वही तानों में जकड़े।
माथे पर शिकन की लकीरें,
चेहरे पर थकान की मार है,
हालातों से जूझता हर दिन
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

कागज़ की रद्दी-सी लगती
अब दर्जनों डिग्रियाँ सारी,
फ्रेमों में कैद प्रमाणपत्र,
जैसे बीते कल की बीमारी।
रोज़ नए फॉर्म, नई परीक्षा,
फिर भी खाली हर दरबार है,
निराशा में आशा ढूँढ़ता
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

देश बहसों में उलझा बैठा,
मंदिर-मस्जिद के नारों में,
रोज़गार की बात दब गई
वायदों के अख़बारों में।
मंचों पर भाषण ऊँचे हैं,
ज़मीं पर सूखा बाज़ार है,
सपनों का बोझ उठाए फिरता
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

मनोबल टूटा कई दफ़ा
अपनों के तिरस्कार से,
“निकम्मा”, “निठल्ला” सुनता रहा
रिश्तों के खुले बाज़ार से।
फिर भी हौसले बाँधकर
वह संघर्ष को तैयार है,
डगमगाते कदम सँभालता
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

चाचा आयोग में नहीं,
जीजा किसी विभाग में नहीं,
मेहनत अक्सर हार जाती
भाई-भतीजावाद के आगे कहीं।
काबिलियत कतारों में खड़ी,
सिफ़ारिश हर शह पर सवार है,
फिर भी सफलता की आस लिए
हर पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

हार नहीं मानी अब तक उसने,
बस थोड़ा थका थोड़ा लाचार है,
भीड़ भरे इस देश में शायद
वह खुद से बिछड़ा हुआ यार है।
फिर भी सफलता की आश लगाए, 
हर पढ़ा लिखा बेरोजगार है।