दीवारें चुप हैं, पर उनमें दरारें बहुत हैं,
चुप्पियों के पीछे दबी पुकारें बहुत हैं।
हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे जो छिपा है,
उस दर्द के समंदर के किनारे बहुत हैं।
घर है ये या कोई सज़ा की कोठरी,
यहाँ रिश्तों की बोली में बेगारे बहुत हैं।
जहाँ हर थप्पड़ के बाद यही सुनाई देता है—
“सिसकियाँ बंद करो, वरना विकल्प तुम्हारे बहुत हैं।”
कहीं माँ का आँचल जलती सिगरेट से जला,
कहीं डरे-सहमे पुरुष बेचारे बहुत हैं।
जिसे जैसे ढाला समाज ने, वैसे ही ढल गए,
क्योंकि ढोंगी समाज-सुधारक हमारे बहुत हैं।
रात की ख़ामोशी में चीखें गूँजती बहुत हैं,
खंडहर मकानों की अब भी दीवारें बहुत हैं।
अंदरूनी बातें हवा से भी तेज़ फैलती हैं,
प्लास्टर वाले घरों में भी दरारें बहुत हैं।
दर्द अब लिपस्टिक के नीचे छुपा रहता है,
आँखों में बेबसी के मगर नज़ारे बहुत हैं।
तहज़ीब सिखाई जाती है सिर्फ बेटियों को ही,
“खुले सांड से घूम रहे बेटे प्यारे बहुत हैं।”
रिश्तों की आड़ में ज़ुल्म सहते लोग यहाँ,
धीरे-धीरे ज़िंदगी से हारे बहुत हैं।
और समाज “मामला व्यक्तिगत” कहकर चुप है,
ये मीठा बोलने वाले भी खारे बहुत हैं।
अब वक़्त है इन बंद कमरों की साँकलें तोड़ने का,
हर ख़ामोशी को आवाज़ देने को मीनारें बहुत हैं।
मिलेगा न्याय और अधिकार हर मज़लूम को यहाँ,
दृढ़ और सशक्त अब भी दरबारें बहुत हैं।

This isn't just a poem, it's the representation of those voices that are often silenced. This poem asks questions and holds a mirror up to society.
ReplyDeleteAbsolutely mam, for someone these would be only lines and words but for those who have great vision to see deep inside the words, is complete package of emotions and feelings.
Delete👏👏💯
ReplyDeleteThank you
DeleteBehtreen
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteऐसी सिसकी और का एक ऐसा चेहरा जो कोई देखना नहीं चाहता आपने दबी आवाज़ को ऊँचे स्वर में कहकर आधी आबादी के.प्रति अपनी सहृदयता जतायी।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २६ सितंबर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत बहुत आभार 🙏
Delete🥰🥰🥰🥰🥰
ReplyDelete😍😍😍😍😍
Deleteसशक्त रचना
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया
Deleteसशक्त लेखन,
ReplyDeleteबंद दरवाज़ों को खटखटाना होगा,
हर सच, हो जितना भी कटु बाहर आना होगा
धन्यवाद महोदया 🙏
Deleteआपकी कविता की हर एक लाइन जैसे किसी दबे हुए दर्द को ज़ोर से सामने रखती है। समाज बाहर से कितना सभ्य दिखता है, लेकिन अंदर दरारें ही दरारें हैं। मुझे अच्छा लगा कि आपने सिर्फ शिकायत नहीं की, बल्कि आखिर में उम्मीद भी दिखाई।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यावाद जी
ReplyDeleteसशक्त सृजन ।बेहतरीन रचना ।
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया
DeleteBahut sundar varnan kiya gaya hai,is se behtar dhang se in sari samasyao ko nhi darshaya ja sakta tha,
ReplyDeleteशुक्रिया
DeleteNice 👏😊
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