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Sunday, October 5, 2025

इकरार के आगे.....

 



दुनिया में बहुत कुछ है प्यार के आगे
सिर्फ मौत ही हल नहीं इंकार के आगे

पलकों पे सजाए रखें हैं तस्वीर तेरी लोग
लेकिन धुँधला पड़ जाता है दीदार के आगे

तेरी महफ़िल में बैठे ही जाँ देकर उठे
हम बचे कैसे रहते तेरे असरार के आगे

ग़म की सौग़ात लिए घूमे हैं सहरा-सहरा
दिल नहीं टिकता किसी भी गुलज़ार के आगे

तेरी आँखों का जादू है कि जंजीर का बोझ
क़ैद हो जाता है इंसाँ भी पहरेदार के आगे

जिस्म चाहे थक गया हो सफ़र की मुश्किल से
रूह रुक नहीं सकती अब मझधार के आगे

शबनमी ख्वाब सजे हैं तेरी पलकों के तले
चाँद भी सर झुकाता है रुख़सार के आगे

ख़ौफ़-ए-तन्हाई से डरता नहीं "हैरी" अब तो
रब की रहमत ही काफ़ी है ग़मगार के आगे

अब "स्याही" भी खामोश नहीं रह सकती दोस्त,
लफ़्ज़ सिर झुका देते हैं इकरार के आगे।





Thursday, September 25, 2025

बंद कमरों की सिसकियाँ...



 दीवारें चुप हैं, पर उनमें दरारें बहुत हैं,
चुप्पियों के पीछे दबी पुकारें बहुत हैं।

हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे जो छिपा है,
उस दर्द के समंदर के किनारे बहुत हैं।

घर है ये या कोई सज़ा की कोठरी,
यहाँ रिश्तों की बोली में बेगारे बहुत हैं।
जहाँ हर थप्पड़ के बाद यही सुनाई देता है—
“सिसकियाँ बंद करो, वरना विकल्प तुम्हारे बहुत हैं।”

कहीं माँ का आँचल जलती सिगरेट से जला,
कहीं डरे-सहमे पुरुष बेचारे बहुत हैं।
जिसे जैसे ढाला समाज ने, वैसे ही ढल गए,
क्योंकि ढोंगी समाज-सुधारक हमारे बहुत हैं।

रात की ख़ामोशी में चीखें गूँजती बहुत हैं,
खंडहर मकानों की अब भी दीवारें बहुत हैं।
अंदरूनी बातें हवा से भी तेज़ फैलती हैं,
प्लास्टर वाले घरों में भी दरारें बहुत हैं।

दर्द अब लिपस्टिक के नीचे छुपा रहता है,
आँखों में बेबसी के मगर नज़ारे बहुत हैं।
तहज़ीब सिखाई जाती है सिर्फ बेटियों को ही,
“खुले सांड से घूम रहे बेटे प्यारे बहुत हैं।”

रिश्तों की आड़ में ज़ुल्म सहते लोग यहाँ,
धीरे-धीरे ज़िंदगी से हारे बहुत हैं।
और समाज “मामला व्यक्तिगत” कहकर चुप है,
ये मीठा बोलने वाले भी खारे बहुत हैं।

अब वक़्त है इन बंद कमरों की साँकलें तोड़ने का,
हर ख़ामोशी को आवाज़ देने को मीनारें बहुत हैं।
मिलेगा न्याय और अधिकार हर मज़लूम को यहाँ,
दृढ़ और सशक्त अब भी दरबारें बहुत हैं।



Friday, July 4, 2025

कल तुम्हारे बच्चे पढ़ेंगे मेरी कहानियाँ


कोई नहीं पढ़ता मेरी लिखी कहानियाँ,
बातें भी मेरी लगती उनको बचकानियाँ।
लहू निचोड़ के स्याही पन्नों पे उतार दी,
फिर भी मेहनत मेरी लगती उनको नादानियाँ।

कल जब सारा शहर होगा मेरे आगे-पीछे,
शायद तब मेरी शोहरत देगी उनको परेशानियाँ।
मैं उनको फिर भी नहीं सुनाऊँगा उनकी हक़ीकत,
मैं भूल नहीं सकता खुदा की मेहरबानियाँ।

आज हालात नाज़ुक हैं तो तमाशा बनाते सब,
मेरी सच्चाई में भी ढूँढ़ लेते हैं खामियाँ।
मेरा भी तो है खुदा, वक़्त मेरा भी बदलेगा वो,
यूँ ही नहीं रहतीं उम्र भर वीरानियाँ।

मुझको हुनर दिया है तो पहचान भी दिलाएगा वो,
यूँ ही नहीं सौंपता कलम हाथों में निशानियाँ।
आज खुद का ही पेट भर पा रहे हैं भले,
कल हम भी करेंगे जरूरतमंदों की निगहबानियाँ।

थोड़ा सब्र कर, इतनी जल्दी न लगा अनुमान,
कामयाबी के लिए कुर्बान करनी पड़ती हैं जवानियाँ।
मैं एक-एक कदम बढ़ रहा हूँ अपनी मंज़िल की ओर,
शोहरत पाने को करता नहीं बेईमानियाँ।

हमने तो चींटी से सीखा है मेहनत का सलीका,
हमें तनिक विचलित नहीं करतीं बाज़ की ऊँची उड़ानियाँ।
वो जो तुम आज बेकार समझ के मारते हो ताने मुझे,
कल तुम्हारे बच्चे पढ़ेंगे मेरी कहानियाँ। ♥️


 

Sunday, June 19, 2022

पापा


 माँ जग की जननी है तो पापा पालनहार हैं

इस दुनियां मे रब का देखो वो दूजा अवतार हैं


दिन की तपिश मे है तपते रातों की नींद गंवाई है

हर कदम सिखाया चलना मुझमे उनकी परछाई है


बिन पापा अस्तित्व मेरा भी सच है मिट ही जाता

दुनियां की इस भीड़ मे अक्सर मेरा मन भी घबराता


लेकिन मेरे अकेलेपन मे साथ खड़े वो होते हैं 

अपने आराम को गिरवी रखकर वो मेरे सपने संजोते हैं 


पंख बने वो मेरे और मुझको सपनों का आसमान दिया 

पापा ही है जिन्होंने हमको खुशियों का जहान दिया 


रब से मुझको शिकवा नहीं बिन माँगे सबकुछ पाया है

शुक्रिया उस रब का जो इस घर मे मुझे जन्माया है


खुद लिए अब कुछ और मांगू इतना भी खुद गर्ज नहीं

माँ पापा रहे सदा सलामत इससे ज्यादा कुछ अर्ज़ नहीं