कुछ ज़ख्म कभी भरते ही नहीं,
कुछ लोग माफ़ करते ही नहीं।
अब रोज़ तानों के बीच खड़ा हूँ,
तारीफ़ों के फूल होंठों से झरते ही नहीं।
अब बिखर गए हैं सारे रिश्ते,
पहले जैसे सँवरते ही नहीं।
जिनके पसीने से हाथ-पैर फूल जाते थे,
वो ख़ून देखकर भी अब डरते ही नहीं।
इतनी कटुता आ गई है संबंधों में,
अब अपराध करके भी बिखरते ही नहीं।
एक दौर में लोग आत्मग्लानि में डूब जाते थे,
अब घिनौने कर्मों में डूबकर भी मरते ही नहीं।
क्या दौर आया है, ख़ुद माली ही
बगिया को पानी से भरते ही नहीं।
अब राम-रहीम कभी एक राह से,
चाहकर भी गुज़रते ही नहीं।
जब सूख चुका हो पानी जड़ों का,
तब फल टहनियों पर ठहरते ही नहीं।
जिस औलाद ने देखा हो तिरस्कार बुज़ुर्गों का,
वो माँ-बाप की इज़्ज़त फिर करते ही नहीं।
जाओ कहीं भी, मत भूलो अपनों को,
वृद्धाश्रमों में घर बस्ते ही नहीं हैं।
जिन्होंने रुलाई हों बूढ़ी आँखों को कभी,
फिर वो जीवन भर कभी हँसते ही नहीं हैं।
दौलत से खरीद लोगे हर सुख ज़माने का,
माँ-बाप के साए बाज़ारों में मिलते ही नहीं हैं।
संबंधों की मिट्टी जब बंजर हो जाए,
फिर प्रेम के फूल चाहकर भी खिलते ही नहीं हैं।

Bahut sundar kavita
ReplyDeleteशुक्रिया
DeleteBhaut khub...
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार गुरुजी 🙏
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