कोई नहीं पढ़ता मेरी लिखी कहानियाँ,
बातें भी मेरी लगती उनको बचकानियाँ।
लहू निचोड़ के स्याही पन्नों पे उतार दी,
फिर भी मेहनत मेरी लगती उनको नादानियाँ।
कल जब सारा शहर होगा मेरे आगे-पीछे,
शायद तब मेरी शोहरत देगी उनको परेशानियाँ।
मैं उनको फिर भी नहीं सुनाऊँगा उनकी हक़ीकत,
मैं भूल नहीं सकता खुदा की मेहरबानियाँ।
आज हालात नाज़ुक हैं तो तमाशा बनाते सब,
मेरी सच्चाई में भी ढूँढ़ लेते हैं खामियाँ।
मेरा भी तो है खुदा, वक़्त मेरा भी बदलेगा वो,
यूँ ही नहीं रहतीं उम्र भर वीरानियाँ।
मुझको हुनर दिया है तो पहचान भी दिलाएगा वो,
यूँ ही नहीं सौंपता कलम हाथों में निशानियाँ।
आज खुद का ही पेट भर पा रहे हैं भले,
कल हम भी करेंगे जरूरतमंदों की निगहबानियाँ।
थोड़ा सब्र कर, इतनी जल्दी न लगा अनुमान,
कामयाबी के लिए कुर्बान करनी पड़ती हैं जवानियाँ।
मैं एक-एक कदम बढ़ रहा हूँ अपनी मंज़िल की ओर,
शोहरत पाने को करता नहीं बेईमानियाँ।
हमने तो चींटी से सीखा है मेहनत का सलीका,
हमें तनिक विचलित नहीं करतीं बाज़ की ऊँची उड़ानियाँ।
वो जो तुम आज बेकार समझ के मारते हो ताने मुझे,
कल तुम्हारे बच्चे पढ़ेंगे मेरी कहानियाँ। ♥️

