Sunday, September 7, 2025

CPR दे रहे हैं....

 

वो जो कहते थे सांसे थम जायेंगी तुमसे बिछड़ कर
सुना है किसी और को CPR दे रहे हैं

तुम हो तुम थे और तुम्हीं रहोगे कहने वाले
किसी और को प्यार बेशुमार दे रहे हैं

किस हद तक देखना पड़ेगा दुनियां का ये दोगलापन
बेवफा लोग आजकल वफा पे ज्ञान यार दे रहे हैं

हमसे हर बात पर तकरार करने वाले,
अब खुलेआम लोगों को उधार दे रहे हैं


बंद कमरे मे एकांत वास हो जाते थे जो घंटों तक
हमसे दूरी क्या बड़ी सबको समय बार बार दे रहे हैं

चेहरे पे नकाब है या नक़ाब मे चेहरा
लगता है ऐसे लोगों को तवज्जो हम भी बेकार दे रहे हैं

Sunday, August 31, 2025

सर्वधर्म समभाव...

 


नसों में बहते लहू से क्या पहचान पाओगे धर्म को,
सबसे ऊपर रखना चाहिए इंसान को अपने कर्म को।

मंदिर में जो दीप जले, मस्जिद में हो जो अज़ान,
गुरुद्वारे की अरदास गूंजे, चर्च में उठे स्तुतिगान।

सभी इबादत एक सी हैं, सबका है बस मर्म यही,
इंसान की सेवा से बढ़कर कुछ भी है धर्म नही।

हवा सभी को मिलती है, जल सबको देता जीवन,
सूरज की किरणें पूछतीं नहीं, किस मज़हब का है तन।

दीवारों के साए में क्यों, नफ़रत के बीज उगाते हो?
इंसान हो जब पैदा होते, फिर क्यों धर्म बतलाते हो?

राहें चारों चाहे अलग हों, मंज़िल मगर एक है,
प्रेम, करुणा, भाईचारा— यही तो चाहता हरएक है।

तोड़ो नफ़रत की बेड़ियाँ, खोलो इंसानियत के द्वार,
धर्म वही जो जोड़ सके सब, बांटे केवल प्यार।|


Monday, August 25, 2025

अँधेरे के सौदागर



ऐ मुन्शी, जाकर कह दो ठेकेदार से,

क्यों सघन अंधेरा छाया है बस्ती में?

क्यों लोग आतुर हैं, खाने को अपनों को ही,

क्या सच में बदल गई है दुनिया नरभक्षी में?


उसी के हिस्से आया था ठेका शायद —

हर कोना शहर का रोशन करने का,

फिर क्यों बुझा दिए लालटेन हर घर के?

नहीं सोचा अंजाम, बूढ़ी आँखों को नम करने का?


ऐ ठेकेदार! मत भर झोली इतनी,

कि बोझ तले तू खुद ही दब जाए।

मुन्शी कहीं तेरा ही बनकर विभीषण,

तेरी काली कमाई को न उजागर कर जाए।


तू सिर्फ धर्म का ठेकेदार है, या

मंदिर-मस्जिद पे भी बोली लगाता है?

या फिर धर्म की इस बँटी बस्ती में

सिर्फ खून की होली मनाता है?


कौन जाति-धर्म का बना है रक्षक तू?

किसने ठेका दिया है आवंटन का?

कैसे भर देता है नफरत रगों में —

क्या तनिक भी खौफ नहीं तुझे भगवन का?


जिसके इशारों पे चलती है कायनात,

उसी को बांटने का तूने काम ले लिया!

अपने फायदे को झोंक दिया पूरा शहर,

और नारों में उसका नाम ले लिया!


अब बंद कर ये धर्म की दलाली,

इस देश को चैन की साँस लेने दे।

मत बरगला युवाओं को झूठे नारों से —

इस बेवजह की क्रांति को अब रहने दे।


जला कर बस्तियाँ रोशनी का ठेका लिया है,

कब तक कफन का सौदा करेगा?

इंसान के कानून से तू बेखौफ है,

क्या दोज़ख की आग से भी न डरेगा?


चल, अब अमन का सौदा कर,

शांति का बन जा तू सौदागर।

विश्व बंधुत्व के जुगनुओं से,

हर घर में फिर उजाला कर

हर घर मे फिर उजाला कर ||