नसों में बहते लहू से क्या पहचान पाओगे धर्म को,
सबसे ऊपर रखना चाहिए इंसान को अपने कर्म को।
मंदिर में जो दीप जले, मस्जिद में हो जो अज़ान,
गुरुद्वारे की अरदास गूंजे, चर्च में उठे स्तुतिगान।
सभी इबादत एक सी हैं, सबका है बस मर्म यही,
इंसान की सेवा से बढ़कर कुछ भी है धर्म नही।
हवा सभी को मिलती है, जल सबको देता जीवन,
सूरज की किरणें पूछतीं नहीं, किस मज़हब का है तन।
दीवारों के साए में क्यों, नफ़रत के बीज उगाते हो?
इंसान हो जब पैदा होते, फिर क्यों धर्म बतलाते हो?
राहें चारों चाहे अलग हों, मंज़िल मगर एक है,
प्रेम, करुणा, भाईचारा— यही तो चाहता हरएक है।
तोड़ो नफ़रत की बेड़ियाँ, खोलो इंसानियत के द्वार,
धर्म वही जो जोड़ सके सब, बांटे केवल प्यार।|
Very nice lines, it will spread the msg of unity in diversity.🙏
ReplyDeleteThank you so much for your words
DeleteBahut sundar panktiyan 👍
ReplyDeleteDhanyabad
Deleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार गुरुजी 🙏
DeleteYour poem reminds us that religion should unite us, not divide us. True religion is humanity itself, where we help one another without any discrimination.
ReplyDeleteThank you so much for your understanding the soul of poem, it means a lot to me. Thank you again
Deleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 1 सितंबर 2025 को लिंक की गई है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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बहुत बहुत आभार 🙏
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