Tuesday, December 23, 2025

कदर....




 


जब बंदर के हाथ लग जाए हल्दी,

या किसी को सबकुछ मिल जाए जल्दी—

तब कदर नहीं होती वक़्त की,

या घमंड कर देता चकनाचूर है।

यहाँ कोई हालातों का मारा,

तो कोई जीता जीवन भरपूर है।


जब अंधे के हाथ लग जाए बटेर,

या भिखारी के हाथ लग जाय धन का ढेर—

तब कदर नहीं होती मेहनत की,

समय भी खो देता अपना नूर है।

यहाँ कोई पानी-सा शीतल रहता,

किसी में आग-सा धधकता गुरूर है।


जब पूस की सर्दी में मिल जाए अलाव,

या बूढ़े जिस्म मे आ जाए ताव—

तब कदर नहीं रहती दाता की,

हर उम्र में इंसान कहीं न कहीं मगरूर है।

यहाँ कोई गैरों से भी होता बेहद करीब,

तो कोई अपनों से भी बहुत दूर है।


जब रणभूमि में मिल जाए संजीवनी,

या तरक्की हो दिन-दूनी रात-चौगुनी—

तब कदर नहीं रहती दवा और दुआ की,

जिंदगी में ऐसा समय भी आता ज़रूर है।

यहाँ कोई सोता शीशमहल के मखमली बिस्तर पर,

तो कोई रातों को जागने को भी मजबूर है।


जब प्यासे को मिल जाए दरिया का किनारा,

या किसी भटके राही को मिल जाए सहारा—

तब कदर नहीं रहती राहों की,

न मंज़िल का रहता कोई सुरूर है।

यहाँ कोई टूटकर भी मुस्कुराता रहता उम्रभर,

कोई सब पाकर भी भीतर से बिल्कुल चूर है।


जब खुशियाँ किसी के दामन में भर जाएँ पूरी,

या किसी के हिस्से आए बस तन्हाई और दूरी—

तब कदर नहीं होती सुकून की,

और हर ज़ख्म होता तब नासूर है।

यहाँ कोई अँधेरों में भी ढूंढ लेता है राह अपनी,

कोई रोशनी में रहकर भी बेनूर है।|




Friday, December 5, 2025

उजड़ा आशियाना ( प्रकृति की मार)


मलबे के ढेर पर बैठा, वो अपना सब कुछ खोकर,
छिपा लिया है चेहरा हाथों में, शायद जी भर रोकर।
कल तक जो एक हँसता-खेलता घर था,
आज वो बस टूटी लकड़ियों और कीचड़ का मंज़र था।

तिनका-तिनका जोड़कर, उम्र भर जो गृहस्थी सजाई थी,
कुदरत के एक कहर ने, पल भर में सब मिटाई थी।
जिन दीवारों में गूँजती थी कभी अपनों की किलकारी,
वहाँ आज पसरी है बस ख़ामोशी और लाचारी।

मिट्टी में सने वो हाथ, जो कभी मेहनत से ना थकते थे,
आज अपनी ही बर्बादी के टुकड़े समेटने को तरसते थे।
आँखों से बहते आँसू, अब सूखकर पत्थर हो गए,
सपने जो देखे थे कल, वो इस सैलाब में कहीं खो गए।

सामने लगा ‘राहत शिविर’ का बोर्ड उसे चिढ़ाता है,
अपने ही घर का राजा, आज भिखारी नज़र आता है।
यह सिर्फ मकान नहीं टूटा, एक इंसान का हौसला टूटा है,
कुदरत, तेरे खेल ने आज फिर एक गरीब का घर लूटा है।







Friday, November 28, 2025

मरने से पहले...


कुछ तो समेट लूँ पंक्तियों में, अल्फ़ाज़ बिखरने से पहले,
क्या दो-चार पल जी लूँ मैं भी, यूँ मरने से पहले।
मेरी रूह काँप उठती है, तेरा किसी और का सोचते ही,
क्या उसके कदम ना डगमगाए होंगे, दगा करने से पहले।

अब किससे कहूँ — ये ज़ख़्म रफ़ू कर दे लफ़्ज़ों से,
मैं दर्द की हर हद छू लेना चाहता हूँ, गुज़रने से पहले।
अब साँसों में भी उतरने लगा है धीरे-धीरे ज़हर,
मैं खुद को समेट लेना चाहता हूँ, फिर बिखरने से पहले।

तुम मानो या ना मानो मेरी हाल-ए-दिल की दास्ताँ,
मैं सब कह देना चाहता हूँ, भीतर सन्नाटा भरने से पहले।
एक रोज़ तुम भी तड़पोगे किसी अज़ीज़ की ख़ातिर,
तब समझोगे — क्या होता है, रोज़ मरना मरने से पहले।

आज हर ख़ता मेरी ही नज़र आती होगी तुम्हें,
कभी मेरा हाल भी देखा था, यूँ सँवरने से पहले?
ये बिखरे ख़्वाब, ये तल्ख़ लहजा — सब तेरी इनायत है,
मेरा दिल भी साफ़ था कभी, तेरे दिल में ठहरने से पहले।

अब और लिखूँगा तो कलम भी रो पड़ेगी हालात पर,
तेरा एक आँसू ना गिरा — मेरी खुशियाँ हरने से पहले।
दो-चार दिन और दिखूँगा शायद तेरे मोहल्ले में,
मैं बस जी भर के देखना चाहता हूँ तुझे — बिछड़ने से पहले।