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हया भी कोई चीज होती है अधोवस्त्र एक सीमा तक ही ठीक होती है संस्कार नहीं कहते तुम नुमाइश करो जिस्म की पूर्ण परिधान आद्य नहीं तहजीब होती है ...
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मैं मिलावटी रिश्तों का धंधा नहीं करता बेवजह किसी को शर्मिदा नहीं करता मैं भलीभाँति वाकिफ हूँ अपने कर्मों से तभी गंगा मे उतर कर उसे गंदा...
मूक बना, क्या और क्यूँ तकता रहता है, ऊपर बैठा ! अब तो लगता है देर तो है ही, अंधेर भी है
ReplyDeleteसही कहा आपने sir...
DeleteWah kya Khub likha hai aaj ke halato ke bare me
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteजी नमस्ते ,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार(२२-१०-२०२१) को
'शून्य का अर्थ'(चर्चा अंक-४२२५) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
सादर आभार आपका
Deleteजी नमस्ते,
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना शुक्रवार २२ अक्टूबर २०२१ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत-बहुत आभार आपका mam 🙏
Deleteबहुत सुंदर।
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteसामायिक यथार्थ पर हाहाकार करती लेखनी ,काश सच कोई तो रोके ऐसे दारुण दुर्दांत दशा को ।
ReplyDeleteमर्मस्पर्शी सृजन।
शुक्रिया 🙏
Deleteआइए कुछ क्षण शोक करें
ReplyDeleteचलो फिर से कुछ मोमबत्तियाँ जलाये
हुक्मरान फिर झूठा दिलासा देंगे
फिर से मानवता वाला ढोंग करें
यही तो आज तक हम करते आए हैं,
मौन व्रत रखते हैं मोमबत्तियां जलाते हैं,
अब तो यह एक परंपरा सी हो गई है!
बहुत ही मार्मिक वही देश पर सी रचना!
शुक्रिया
Deleteमर्मस्पर्शी
ReplyDeleteबहुत-बहुत आभार
Deleteइन्सानियत मर चुकी नारी का दर्द सुने कौन। मार्मिक रचना।
ReplyDeleteशुक्रिया हौसला अफजाई के लिए
Deleteमार्मिक सृजन ।
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteचिन्तनीय चिंतन भावपूर्ण रचना
ReplyDeleteशुक्रिया sir जी
Deleteएक संवेदनशील रचना को अंतस का मौन क्रंदन है
ReplyDeleteशुक्रिया mam
Deleteमार्मिक रचना।
ReplyDeleteबहुत-बहुत आभार
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