Saturday, April 6, 2024

तन खा गई तनख्वाह...



 
तन खा गई तनख्वाह मेरी
वेतन बेवतन कर गई
अस्थायी सी नौकरी मेरी
ना जाने कितने सितम कर गई

समय की परवाह बिना
चाकी सा पिसता रहता हूं
वक्त से तालमेल बिठाने को
बेवक्त घिसता रहता हूं

लहू में भी घुल रहीं
संघर्षों की अदृश्य गोलियाँ
ढल रहा फिरंगी रंग में
भूल गया अपनी भाषा-बोलियाँ

फिर भी कम लगती है उनको
मेरी मेहनत-मजदूरियाँ
सल्फास की गोलियाँ रखी हैं मगर
खाने नहीं देती मजबूरियाँ

नन्ही उम्र में ही छोड़ आए थे
गाँव की चौपाल सब 
अजनबी समझने लगे हैं
अपने ही बाल-गोपाल अब

कमाई ने बस “कम-आय” दी
सपनों पर संकट छा गई
अब किससे जा के कहूँ ‘जनाब’
तनख्वाह मेरी तन खा गई ।




20 comments:

  1. हृदयस्पर्शी सृजन ।

    ReplyDelete
  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 10 अप्रैल 2024को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
  3. आहा ... बेहतरीन अंदाज़ है ...
    कमाल की रचना ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत आभार गुरुदेव 🙏

      Delete
  4. Bhot khub Bhaiya 🥳❤️ 🥰

    ReplyDelete
  5. अति सुन्दर बॉस

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत आभार

      Delete
  6. यार, ये कविता पढ़कर तो जैसे हर मेहनतकश इंसान का दर्द आँखों के सामने आ गया। तनख्वाह का नाम सुनते ही सबको उम्मीद होती है कि जिंदगी आसान होगी, लेकिन सच में वही तनख्वाह तन खा जाती है। गाँव छोड़कर शहर में पिसते रहना, वक्त और अपनी भाषा तक खो देना, ये हकीकत बहुत कड़वी है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया, शब्दों के मायने समझने के लिए 🙏

      Delete