मलबे के ढेर पर बैठा, वो अपना सब कुछ खोकर,
छिपा लिया है चेहरा हाथों में, शायद जी भर रोकर।
कल तक जो एक हँसता-खेलता घर था,
आज वो बस टूटी लकड़ियों और कीचड़ का मंज़र था।
तिनका-तिनका जोड़कर, उम्र भर जो गृहस्थी सजाई थी,
कुदरत के एक कहर ने, पल भर में सब मिटाई थी।
जिन दीवारों में गूँजती थी कभी अपनों की किलकारी,
वहाँ आज पसरी है बस ख़ामोशी और लाचारी।
मिट्टी में सने वो हाथ, जो कभी मेहनत से ना थकते थे,
आज अपनी ही बर्बादी के टुकड़े समेटने को तरसते थे।
आँखों से बहते आँसू, अब सूखकर पत्थर हो गए,
सपने जो देखे थे कल, वो इस सैलाब में कहीं खो गए।
सामने लगा ‘राहत शिविर’ का बोर्ड उसे चिढ़ाता है,
अपने ही घर का राजा, आज भिखारी नज़र आता है।
यह सिर्फ मकान नहीं टूटा, एक इंसान का हौसला टूटा है,
कुदरत, तेरे खेल ने आज फिर एक गरीब का घर लूटा है।
Friday, December 5, 2025
उजड़ा आशियाना ( प्रकृति की मार)
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मैं मिलावटी रिश्तों का धंधा नहीं करता बेवजह किसी को शर्मिदा नहीं करता मैं भलीभाँति वाकिफ हूँ अपने कर्मों से तभी गंगा मे उतर कर उसे गंदा...


❣️❣️
ReplyDeleteशुक्रिया ♥️
DeleteMast 😊😊
ReplyDeleteधन्यवाद 😊😊
Deleteमार्मिक..
ReplyDeleteशुक्रिया... 👍
Delete🥺🥺
ReplyDelete🥹🥹
Deleteअक्सर ऐसा होता है ... मकाँन नहीं इंसान टूटता है ... टूटने के साथ ....
ReplyDeleteसही कहा आपने महोदय, सिर्फ मकान नहीं टूटता, टूटता है हौसला, उम्मीद, और इंसान का सपना..
Deleteबड़ी ही उम्दा रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया
Deleteसुंदर
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteअत्यंत मार्मिक - सुंदर रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया
Deleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति
Deleteबहुत बहुत शुक्रिया
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