Sunday, January 14, 2024

हुताशन के हवाले अरण्य..


               करके हुताशन के हवाले अरण्य को

निर्झरणी के तलाश मे जाता मनुज है

पवन जलधर को कर वेग प्रवाहित

उम्मीद की रश्मि को अम्बर ले जाता है


वसुधा तरस रहीं सलिल बिन

पुरंदर से लगाए आस है मधुपति भी

वाटिका, सरोज, प्रसून और तरिणी

चक्षु जोह रहे हैं पयोधर के


अंबिका को ही बनकर भुजंग

नर अनल के विशिख छोड़ रहा

महि चपला सी चंचलित होकर

सारे सब्र के बाँध को तोड़ रहीं


प्रलय को जन्म दे रहे फिर

देवनदी, कालिंदी, सरिता और रत्नाकर

भयभीत सभी हैं आभास से विनाश के

थर थर काँप रहे हैं अडिग भूधर


नतमस्तक होकर साष्टांग दण्डवत

कर जोड़े ग़र याचक बनकर

अब भी तरु अंकुरित हो सकते हैं

भव सब विष हर लेंगे फिर से रक्षक बनकर ||



Sunday, December 17, 2023

हार कर फांसी पे चढ़ गया...

 


बेरोज़गार मेरे राज्य का, काँच-सा बिखर गया,

इम्तिहान देना चाहता था, घोटालों से डर गया।


नियुक्तियाँ सब खा गए, नेता के रिश्तेदार,

ज्यों पालक की बेड़ी को, खुला सांड चर गया।


विज्ञप्तियों के इंतज़ार में, चश्मे का नंबर बढ़ गया,

प्रतिस्पर्धा की दौड़ में, वो खुद से ही पिछड़ गया।


सोचा था पहाड़ रहकर, गाँव-घर सँवारेंगे,

पर उसका हर एक ख़्वाब, राजनीति में गड़ गया।


फिर भी हौसला समेटकर, हालातों से लड़ गया,

ना वक़्त साथ दे सका, अपनों से भी बिछड़ गया।


नाकामियाँ मजबूर कर, हार उसकी गढ़ रहीं,

ज्यों कच्चा फल डाल पर, पकने से पहले सड़ गया।


दीमक लगी प्रतिभा को, संतुलन भी बिगड़ गया,

फिर भी सफलता के लिए, किस्मत से वो अड़ गया।


आख़िर जला दीं डिग्रियाँ, सपनों की हर पोटली,

एक और बेरोज़गार फिर, फाँसी पे चढ़ गया।






Thursday, October 26, 2023

कविता स्पष्ट है बरदोश नहीं है..



कविता स्पष्ट है बरदोश नहीं है

अर्द्ध मूर्छित है मगर बेहोश नहीं है

जो चाहे जिस भाषा शैली में गड़े 

व्यंगात्मक हो सकती है मगर रूपोश नहीं है 


कोई तारीफ लिखे कोई नाकामियाँ 

कोई व्याकुलता कोई संतोष लिखे 

कोई अमन शांति का पैगाम दे  

कोई उबलते जज्बातों का आक्रोश लिखे 


कुछ लिखते हैं अनकहे जज्बातों को 

कुछ अपने व्यंग्य का सैलाब लिखे 

कुछ धरती के मनोरम सौंदर्य का करते वर्णन 

कुछ कटु वर्णो से तेजाब लिखे 


कुछ प्रेम का सुंदर आभास लिखते हैं 

कुछ दबे कुचले लोगों की आवाज लिखे 

कुछ लिखते हैं खामोशी आपातकाल की 

कुछ 1857 की क्रांति का आगाज लिखे 


हर कोई अपने तरीके से तोड़ मरोड़ कर 

नए रचनाओं से नए शब्दों को आयाम देते हैं 

कोई फैलाते है जहर दुनियाँ मे 

कोई हर ओर शांति का पैगाम देते हैं 


बहरे है लोग भले गूंगी सरकार चाहे 

जंग जारी है कवि खामोश नहीं है 

कितनी कर लो अवहेलना विरोध मे 

कविता स्पष्ट है बरदोश नहीं है ||

बरदोश = छुपी हुयी 

रूपोंश = भागा हुआ,