Wednesday, February 21, 2024

पर चूहे से भी डरती है..


हवा से दोस्ती है उसकी,
कलियों से गुफ़्तगू करती है,
शेरनी-सी छवि समेटे हुए,
पर चूहे से भी डरती है।

वाचाल है—सब कह जाती है,
बातें मन में टिकती कहाँ,
खुद ही अपनी खिल्ली उड़ाती,
और हँसती जी भर यहाँ।

अभी तो दुनिया देखी भर है,
फिर भी अनुभव गहरा-तमाम,
कर्मों में लगभग परिपूर्ण,
बातों से लगती है नादान।

भीड़ भरे इस समाज में वो
अपना वजूद बचाती है,
रिवाज़ों के भारी पत्थर से
हर रोज़ खुद को उठाती है।

नाज़ुक-सी है, पर भीतर से
लोहा बनकर जीती है,
टूटे ख्वाबों की किरचों से
फिर अपनी राहें सीती है।

उसकी हँसी में सुकून भी है,
और एक खामोश सवाल भी—
क्यों हर लड़की के हिस्से में
आता है इतना जंजाल भी?

फिर भी हर सुबह उठकर वो
उम्मीद की लौ जलाती है,
अपने छोटे-से आँगन में
पूरा आसमाँ सजाती है।

जुड़ रहा जीवन में उसके,
है एक नया अध्याय आज,
परेशानी में भी हँसा दे सबको,
वो खुशियों की सजीव आवाज़।

दुआ है बस इतना रब से—
उसकी राहें आसान रहें,
वो जैसी है, वैसी ही रहकर
हर दिल की पहचान रहें।

खुशियाँ मिलें उसे अपार,
घर-आँगन में उजियाली हो,
सपने सारे सच हो जाएँ,
वो परिवार की अंशुमाली हो।

 



Sunday, January 14, 2024

हुताशन के हवाले अरण्य..


               करके हुताशन के हवाले अरण्य को

निर्झरणी के तलाश मे जाता मनुज है

पवन जलधर को कर वेग प्रवाहित

उम्मीद की रश्मि को अम्बर ले जाता है


वसुधा तरस रहीं सलिल बिन

पुरंदर से लगाए आस है मधुपति भी

वाटिका, सरोज, प्रसून और तरिणी

चक्षु जोह रहे हैं पयोधर के


अंबिका को ही बनकर भुजंग

नर अनल के विशिख छोड़ रहा

महि चपला सी चंचलित होकर

सारे सब्र के बाँध को तोड़ रहीं


प्रलय को जन्म दे रहे फिर

देवनदी, कालिंदी, सरिता और रत्नाकर

भयभीत सभी हैं आभास से विनाश के

थर थर काँप रहे हैं अडिग भूधर


नतमस्तक होकर साष्टांग दण्डवत

कर जोड़े ग़र याचक बनकर

अब भी तरु अंकुरित हो सकते हैं

भव सब विष हर लेंगे फिर से रक्षक बनकर ||



Sunday, December 17, 2023

हार कर फांसी पे चढ़ गया...

 


बेरोज़गार मेरे राज्य का, काँच-सा बिखर गया,

इम्तिहान देना चाहता था, घोटालों से डर गया।


नियुक्तियाँ सब खा गए, नेता के रिश्तेदार,

ज्यों पालक की बेड़ी को, खुला सांड चर गया।


विज्ञप्तियों के इंतज़ार में, चश्मे का नंबर बढ़ गया,

प्रतिस्पर्धा की दौड़ में, वो खुद से ही पिछड़ गया।


सोचा था पहाड़ रहकर, गाँव-घर सँवारेंगे,

पर उसका हर एक ख़्वाब, राजनीति में गड़ गया।


फिर भी हौसला समेटकर, हालातों से लड़ गया,

ना वक़्त साथ दे सका, अपनों से भी बिछड़ गया।


नाकामियाँ मजबूर कर, हार उसकी गढ़ रहीं,

ज्यों कच्चा फल डाल पर, पकने से पहले सड़ गया।


दीमक लगी प्रतिभा को, संतुलन भी बिगड़ गया,

फिर भी सफलता के लिए, किस्मत से वो अड़ गया।


आख़िर जला दीं डिग्रियाँ, सपनों की हर पोटली,

एक और बेरोज़गार फिर, फाँसी पे चढ़ गया।