Wednesday, July 30, 2025

मैं पंचतत्व हूँ.......

 


उठेगा जनाज़ा एक रोज़ और फिर राख हो जाऊँगा मैं

होकर पंचतत्व मे विलीन शायद पाक हो जाऊँगा मैं 

कुछ दिन सूना रहेगा मेरा कमरा और घर आँगन 

फिर धीरे धीरे सबके लिए अख़लाक़ हो जाऊँगा मैं 


किसी दीवार पर टंगी होगी फिर तस्वीर अपनी 

तब परमात्मा ही तोड़ेगा मोह की जंजीर अपनी 

भुला देगा मोह माया और संपति का लालच 

फिर किसी नयी योनी मे बनानी होगी स्वयं तकदीर अपनी 


फिर कोई बच्चा मेरी ही साँसों में जीवन पाएगा

मेरी परछाई बनके ही शायद वो भी मुस्कुराएगा

वो खेलेगा उन्हीं गलियों में जहाँ बचपन मेरा पला

पर न जाने कौन उसे मेरे बारे मे बतायेगा 


शायद एक वृक्ष बन किसी छाँव का कारण बनूँगा

या किसी श्मशान की राख में फिर मौन सा सज़ूँगा

दुनिया के मेले में कोई नहीं रोकेगा पथ मेरा

क्योंकि मिट्टी हूँ मैं — पंचतत्व मे विलीन होकर भी रहूँगा 


जिसे समझा मैंने "मेरा", सब यहीं रह जाएगा

तो आज जो हूँ, वही सत्य जीवन पर्यन्त नहीं है

बस आत्मा ही है जो चुपचाप सफर तय कर जाएगा

क्योंकि अंत भी तो जीवन का कोई अंत नहीं है...


Thursday, July 24, 2025

मुफ़लिसी के साए में...



कौड़ियों के दाम जब बिक रहे जज़्बात गर,
क़ैदख़ाना-सा लगे जब अपना ही हो घर।
फिर किस मक़ाम जाकर मिले कतरा-ए-सुकूँ,
जब आँख मूँदते ही सताए मुस्तक़बिल का डर।

जब बिन विषधर के ज़ुबाँ उगलने लगे ज़हर,
लफ़्ज़ बन जाएँ तीर, और हर ढाल बेअसर।
फिर क्यों न बिखरे कोई, ख़िज़ाँ के पत्तों-सा,
जब जिस्म बेच फिर भी न जले चूल्हा-ए-घर।

मजबूरियों का फंदा तब घोंटता है साँस को,
जब झूठ का शोर दबा दे सच की आवाज़ को।
कौन करता है यूँ ही ख़्वाहिशों का तर्पण,
कुछ तो बाँध रहा होगा हौसलों की परवाज़ को।

किसका करता है दिल तर्क इस जहान को,
मुफ़लिसी लूट लेती है ख़्वाब और अरमान को।
जब रूह में हर घड़ी सुलगती रहे बेचैनी,
तो मौत भी लगे राहत फिर थके इंसान को।



Sunday, July 20, 2025

"मैं और तुम — एक अधूरी पूर्णता"...

मैं हूँ खुली किताब सा तेरे लिए 
तुम मेरे लिए एक पहेली हो
मै वीरान कोई मकान पुराना
तुम एक अलीशान हवेली हो

मैं बंजर जमीं का टुकड़ा सा 
तुम खेत खुले हरियाली हो
मै मुरझा एक टूटा पत्ता सा 
तुम कलियो की लाली हो

मैं बूंद बूंद बहता पानी
तुम सागर अपरम्पार हो 
मै धरा का एक हिस्सा मात्र 
तुम सारा ही संसार हो 

तुमसे ही हर रिश्ता है जग मे 
मैं उस रिश्ते की डोर हूं 
तुम शीतल चांद हो गगन की 
मैं तुमको तकता चकोर हूँ 

मैं भोर का हूँ एक डूबता तारा 
तुम प्रकाश दिनकर के हो 
मैं एक अभिशाप सा हूँ धरती पर 
तुम वरदान ईश्वर के हो

मैं सूनी राहों का एक मुसाफ़िर,
तुम मंज़िलों की कहानी हो।
मैं टूटी-बिखरी सी लकीर,
तुम किस्मत की निशानी हो।

मैं धूप की जलती छाया हूँ,
तुम सावन की रिमझिम बूँदें हो।
मैं अधूरी कोई आरज़ू,
तुम ख़्वाबों की सौगंधें हो।

मैं समय की धूल में खोया पल,
तुम कालचक्र की धुरी हो।
मैं एक अधूरा सा अध्याय,
तुम इक सदी पूरी हो।

मैं एक दबी चीख़ सा मौन,
तुम शंखनाद की वाणी हो।
मैं साधारण सी परछाईं,
तुम दिव्य ज्योति-कल्याणी हो।

मैं एक प्रश्न बनकर रह गया,
तुम हर उत्तर की धार हो।
मैं बस एक झलक भर हूँ,
तुम दृश्य सम्पूर्ण संसार हो।