हर युद्ध के बाद
किसी को तो राख समेटनी ही पड़ती है,
दीवारों से चिपकी चीखों को
धीरे-धीरे खुरचना ही पड़ता है।
किसी को तो हटाना ही होगा
मलबा सड़कों के किनारों तक,
तभी तो लाशों से भरी गाड़ियाँ
शहर के आर-पार जा सकेंगी।
किसी का पाँव तो धँसेगा ही
कीचड़, राख और खून में,
टूटी कुर्सियाँ, बिखरे खिलौने,
फटे हुए वस्त्र और बुझी आँखें—
सब गवाही देंगे
कि सभ्यता फिर हार गई।
किसी को तो रखनी होगी
नई दीवारों की बुनियाद,
और किसी को रोशनदान बनकर
घुटते कमरों में हवा उतारनी होगी।
यह आग अचानक नहीं भड़की,
बरसों से भीतर सुलग रही थी,
नफ़रत के सूखे पत्तों पर
स्वार्थ का तेल डाला गया था।
हथियार फिर चमकाए जा रहे हैं,
एक और युद्ध के लिए।
हमें फिर से उठना होगा,
एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा,
घर के कलह से लेकर
दुनिया के रणक्षेत्र तक
बिखरती शांति को
अपने हाथों से समेटना होगा।
याद है अभी भी वह छवि—
हाथ में बस एक साधारण छड़ी,
पर सत्य की लौ इतनी प्रखर
कि साम्राज्य की नींव हिल गई।
अहिंसा के दो शांत हथियारों ने
क्रूर सत्ता का तख़्त डुला दिया था।
आस्तीनों में आज भी
कई साँप पल रहे हैं,
भले कारतूसों पर जंग चढ़ी हो,
हौसले अब भी ज़िंदा हैं।
जाँबाज़ इरादे आज भी
कालिया नाग के फन कुचल सकते हैं।
घास के बीच फिर उग आई हैं
रक्तरंजित कुछ कोंपलें,
किसी को तो थामना होगा हाथ,
इन जर्जर टूटते हौसलों का।
क्योंकि हर युद्ध के बाद
सिर्फ शहर नहीं टूटते,
मनुष्य भी बिखरता है—
और किसी को तो
उसे फिर से इंसान बनाना पड़ता है।
— हैरी


Wow da
ReplyDeleteAwsm❤️
ReplyDeleteजी नमस्ते ,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार(१०-०९-२०२१) को
'हे गजानन हे विघ्नहरण '(चर्चा अंक-४१८३) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
बहुत-बहुत आभार
DeleteAwesome lines
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteहमें फिर से आवश्यकता हो
ReplyDeleteएक जुट होकर आगे आने की
गृह क्लेश से विश्व युद्ध तक रोक कर
बिखरते शांति को संजोने की।
बिल्कुल सही कहा सर आपने हम सबको एक होने की जरूरत है गृह क्लेश को रोकने की जरूरत है !क्योंकि यही गृह क्लेश को एक दिन विभाजन का रूप लेते हुए दे नहीं लगेगी! हम सबको हिंदू मुस्लिम सिख इसाई नहीं बल्कि हिंदुस्तानी बनकर रहना होगा ! जाति धर्म के नाम पर हो रहे व्यक्ति द्वारा व्यक्ति के शोषण को रोकना ही होगा!तभी अखंड भारत का सपना हकीकत में तब्दील होगा!
बहुत ही उम्दा रचना
पहाड़ के द्स्र्द को बाखूबी लिखा है आपने ...
ReplyDeleteकितनी यन्त्रण झेती है ये प्राकृति और अपने ही बनाए क्र्तित्व से ... इंसान से ... काश कोई बदलाव आ सके ...
किसी को तो पहल करनी होगी । अच्छी रचना ।
ReplyDeleteशुक्रिया mam
Deleteसुंदर सृजन...
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteबेहतरीन और बेहद खूबसूरत आगे
Deleteअगर और भी 'hindi status 2021' पढ़ना चाहते है तो आप
शुक्रिया
Deleteसुन्दर एवं प्रभावी सृजन ।
ReplyDeleteबहुत-बहुत शुक्रिया
DeleteAwesome lines
ReplyDeleteThank you
DeleteWow 🥰😀 keep it up Bhaiya ❤️🥰
ReplyDeleteThank you dear ❤️
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