बेरोज़गार मेरे राज्य का, काँच-सा बिखर गया,
इम्तिहान देना चाहता था, घोटालों से डर गया।
नियुक्तियाँ सब खा गए, नेता के रिश्तेदार,
ज्यों पालक की बेड़ी को, खुला सांड चर गया।
विज्ञप्तियों के इंतज़ार में, चश्मे का नंबर बढ़ गया,
प्रतिस्पर्धा की दौड़ में, वो खुद से ही पिछड़ गया।
सोचा था पहाड़ रहकर, गाँव-घर सँवारेंगे,
पर उसका हर एक ख़्वाब, राजनीति में गड़ गया।
फिर भी हौसला समेटकर, हालातों से लड़ गया,
ना वक़्त साथ दे सका, अपनों से भी बिछड़ गया।
नाकामियाँ मजबूर कर, हार उसकी गढ़ रहीं,
ज्यों कच्चा फल डाल पर, पकने से पहले सड़ गया।
दीमक लगी प्रतिभा को, संतुलन भी बिगड़ गया,
फिर भी सफलता के लिए, किस्मत से वो अड़ गया।
आख़िर जला दीं डिग्रियाँ, सपनों की हर पोटली,
एक और बेरोज़गार फिर, फाँसी पे चढ़ गया।


🥰🥰🥰🥰🥰🥰🤗🤗🤗🤗🤗🤗🤗🤗
ReplyDelete😍😍😍😍❤️
Delete100% right bhaiya 👌 kya likha hai maza aa gya
ReplyDeleteThank you
DeleteVery nice
ReplyDeleteThank you
Deleteसुन्दर और v सटीक
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार गुरुजी 🙏
Deleteबेहद मार्मिक अभिव्यक्ति.... एक रेखाचित्र खींच दिया आपने शब्दों से जिसकी तकलीफ़ महसूस की जा सकती है।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १९ दिसम्बर २०२३ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत बहुत आभार
Deleteमर्मस्पर्शी सृजन ।
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया
Deleteहिम्मत ही तो नहीं हारनी है, जो डर गया वह जीवन की बाज़ी कभी जीत नहीं पाता
ReplyDeleteबिल्कुल सही कहा आपने लेकिन मजबूरी और तिरस्कार कभी कभी भारी पड़ जाती हैं
ReplyDeleteआज के ताज़ा हालात पे कमाल का तप्सरा ...
ReplyDeleteमर्म को छूते हुए बंध ...
बहुत बहुत आभार महोदय 🙏
Deleteआपकी कविता पढ़ कर लगा जैसे हर लाइन किसी अपने की कहानी सुना गई। हम भी तो इसी सिस्टम में फंसे हैं—फॉर्म भरो, इंतजार करो, फिर घोटालों की खबर सुनो। मेहनत करते-करते कई दोस्त टूट गए, कुछ तो सच में इस लड़ाई में खुद से हार गए।
ReplyDeleteसच ही कहा.... बस एक कोशिश की है...
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