Wednesday, July 30, 2025

मैं पंचतत्व हूँ.......

 


उठेगा जनाज़ा एक रोज़ और फिर राख हो जाऊँगा मैं

होकर पंचतत्व मे विलीन शायद पाक हो जाऊँगा मैं 

कुछ दिन सूना रहेगा मेरा कमरा और घर आँगन 

फिर धीरे धीरे सबके लिए अख़लाक़ हो जाऊँगा मैं 


किसी दीवार पर टंगी होगी फिर तस्वीर अपनी 

तब परमात्मा ही तोड़ेगा मोह की जंजीर अपनी 

भुला देगा मोह माया और संपति का लालच 

फिर किसी नयी योनी मे बनानी होगी स्वयं तकदीर अपनी 


फिर कोई बच्चा मेरी ही साँसों में जीवन पाएगा

मेरी परछाई बनके ही शायद वो भी मुस्कुराएगा

वो खेलेगा उन्हीं गलियों में जहाँ बचपन मेरा पला

पर न जाने कौन उसे मेरे बारे मे बतायेगा 


शायद एक वृक्ष बन किसी छाँव का कारण बनूँगा

या किसी श्मशान की राख में फिर मौन सा सज़ूँगा

दुनिया के मेले में कोई नहीं रोकेगा पथ मेरा

क्योंकि मिट्टी हूँ मैं — पंचतत्व मे विलीन होकर भी रहूँगा 


जिसे समझा मैंने "मेरा", सब यहीं रह जाएगा

तो आज जो हूँ, वही सत्य जीवन पर्यन्त नहीं है

बस आत्मा ही है जो चुपचाप सफर तय कर जाएगा

क्योंकि अंत भी तो जीवन का कोई अंत नहीं है...


20 comments:

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    1. बहुत बहुत आभार और धन्यवाद गुरुजी 🙏

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  2. Bahut sundar, insan ki journey ko bakhubi darshaya gaya hai.keep written keep growing dear

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  3. Mast ❤️😊😊😊😊😊😊😊

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  4. बहुत सुन्दर रचना 🙏

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  5. Bhaut khub ❤🌼

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  6. भाईसाब, ये कविता पढ़कर तो दिल कहीं शांत हो गया और दिमाग कहीं बेचैन। कितनी सच्ची बात है ना, हम पूरी ज़िंदगी चीज़ों और रिश्तों को पकड़ने में निकाल देते हैं, और अंत में हाथ खाली रह जाते हैं। आपके शब्दों ने मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि जिंदगी में हल्के होकर जीना ही असली कला है। सादा, सच्चा और मोह-माया से थोड़ा ऊपर उठकर।

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    1. बहुत बहुत आभार और धन्यवाद

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  7. बेहद सुंदर रचना

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  8. बेबाकी से सच को बयाँ करती रचना ...

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    1. बहुत बहुत आभार और धन्यवाद महोदय 🙏

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