Sunday, December 22, 2024

कल बहुत पछताओगे...


 नफ़रतों का दौर है साजिश के मुहल्ले मे

लूट की कमाई है बेईमानों के गल्ले मे

भूख से कराहते गरीब अपनी झोपड़ी में

सारी दौलत धरी पडी है अमीरों के पल्ले मे


भूख की आग से अधजला भिखारी है

वस्त्र विहीन पडी अर्द्ध मूर्छित नारी है

खिलोनों वाले हाथो मे तगार भरा तसला है

जाति धर्म आज भी सबसे बड़ी बिमारी है


एक है वो जो कुछ खरोंच से हैरान है

किसी की तपती ईट के भट्टे में जान है 

किसी की तो मिटती नहीं भूख दौलत की कभी 

कोई सौ रुपये के लिए भी यहां बहुत परेशान हैं 


मजबूर हर आदमी जर जर हालात है 

प्यादे भी देते कभी वजीर को मात है 

सिकंदर कितने ही समा गए इस मिट्टी मे 

फिर भी सर्वेसर्वा समझे खुद को एक जमात है 


गहराई नदी नालों का तो नाप लिया इंसान ने 

खुद की गहराई  नापने का ना कोई औजार है 

हर चीज करीब ले आयी विज्ञान की नई खोज ने 

बस अपनों को करीब रखने को ना कोई तैयार है 


मखमली बिस्तर के लिए नींद कहाँ से लाओगे 

मजलूम और बेसहारों को कब तक सताओगे

अंत मे सबकुछ यहां धरा का धरा रह जाना है 

कल खुद ही खुद के कर्मों पे तुम बहुत पछताओगे ||


Tuesday, November 26, 2024

"अबला नहीं — जाग्रत ज्वाला बन".....





क्या सन् सत्तावन के बाद किसी

सिहनी ने तलवार लिया नहीं कर मे

या माँ ने जननी बन्द कर दी

लक्ष्मीबाई अब घर-घर में


क्यों इतने कमजोर बेबस बन गये

क्या रक्त सूख गया काली के खंजर मे

क्यों लटक रहे कुछ फंदे से 

क्यों विलाप कर रही कुछ पीहर मे,


अरे इस देश मे तो देवियाँ पूजी जाती है,

फिर बेटी क्यूँ मृत लिपटी मिलती है चादर में

क्या आदिशक्ति भी शक्तिहीन हो गयी

या दानव शक्ति प्रबल हो गयी भूधर में


क्या कान्हा के सारे दाव-पेच फेल हो गये

या प्रभाव फीका हो गया नीलकंठ के जहर मे

या फिर कलयुग अपने चरम सीमा पे है.

क्या सब दैवीय शक्ति विलुप्त हो गये थे द्वापर मे 


अगर नवरात्रि मानते है सब श्रद्धा से 

फिर क्यूँ खुद की बेटी सहमी है डर मे 

प्रश्नो के इस भंडार मे असमंजस 

कहीं खुद का सिर ना दे मारूं पत्थर मे 


सिहनी से उसका शावक चुरा ले

इतना साहस कहाँ से आ गया गीदड़ मे  

श्रृंगार सारे छीन रहा बाहुबल को

वर्ना कभी शक्ति कोपले फूटते थे इस विरान बंजर में


हनुमान बन बैठे सभी शक्ति वाहिनियां

वर्ना कोई समुद्र अड़ंगा बनता ना डगर मे

अब कौन बनेगा इस कलयुग का जामवंत 

जो ला पायेगा बदलाव इनके तेवर मे


खुद की पहचान और अस्तित्त्व के लिए 

नये प्राण फूकने होंगे इस तन जर्जर मे

उठा भाल तलवार बन खुद की रक्षक तू 

कब तक लिपटे रहोगी जेवर मे ||

Thursday, November 7, 2024

हया भी कोई चीज होती है...

 


हया भी कोई चीज होती है

अधोवस्त्र एक सीमा तक ही ठीक होती है


संस्कार नहीं कहते तुम नुमाइश करो जिस्म की

पूर्ण परिधान आद्य नहीं तहजीब होती है


नोच खाते हैं लोग आँखों से ही खुले कलित तन को

तभी कहावत में भी बेटी बाप के लिए बोझ होती है


मैं कौन होता हूँ आपकी आजादी का हनन करने वाला

बस जानता हूं किसकी कैसी सोच होती है


कुछ दुष्ट तो पालने में पड़ी बच्ची को भी नहीं छोड़ते

तू तो हरदम इन जानवरों के बीच होती है


तुझे खुद भी पता है हकीकत इस सभ्य समाज की

मंदिर मस्जिद में बैठे आडंबरियों की तक सोच गलीच होती हैं


न मुझे न मेरी लेखनी को देखना हीन नज़रों से

हर मर्ज की न उपचार ताबीज़ होती है


कहीं टुकड़ों में बिखरे न मिलो दुष्कर्म का शिकार होकर

तभी कह रहा हूं हया भी कोई चीज होती है ॥





Friday, October 25, 2024

यूँ मर जाना ना होता...

 

कल की बची कुछ उधार सांसे

आज हिसाब मांग रहीं हैं

मजबूरियों की फटी चादर से

परेशानियां झरोखों से झाँक रही हैं


कल के गुज़रे दिन सुहाने

आज जी का जंजाल बन रहीं हैं

कष्ट भरे इस अनचाहे सफर मे

दुखों से जिंदगी की ठन रही है


नाकामयाबी का सैलाब उठता हर रोज

मुश्किलों की आँधी उड़ा ले जाती खुशियों को

चंद बूँदों के लिए तरसती रेगिस्तान सी जिंदगी

फिर क्यूँ पहाड़ सी उम्र दे दी मनुष्यों को


भला होता चार लम्हा जीते मगर सुकून से

इन ग़मों के तूफान से टकराना ना होता

महलों के बजाय रहते बीहड़ो मे ही मगर

अनगिनत आशाओं के तले दबकर मर जाना ना होता ||



Saturday, October 5, 2024

तब कविता जन्म लेती है


 जब कविता जन्म लेती है

जागृत होते हैं रस, छंद, अलंकार और चौपाई

फिर तुकांत मिलाने को

शब्दों मे होती है लड़ाई


भाव उमड़ते हैं हर रस के

करुण, रौद्र, वीर और सहाय

छंदो का करके उचित प्रबंध

कवियों ने काव्य की अलख जगाए


चौपाई का हर एक चरण ही

मात्राओं का बनता नियत निकाय

अलंकार का सही शब्द नियोजन

कविता मे मिठास का रस भर जाय


कभी उपमा से कोयला भी बनता चांद 

कभी हास्य रस गुदगुदी लगाए 

कभी रौद्र रस क्रोध की ज्वाला भर दे 

कभी करुण रस अश्कों से अश्रु बहाए 


कितना सुंदर होता है ये समायोजन 

जो हृदय मे प्रसन्न्ता भर देती है 

एक कवि की बोल उठती है कल्पना 

तब कविता जन्म लेती है ||




Sunday, September 8, 2024

डर लगता है घर जाने पर


 मैं खुद को नाप नहीं पाया

सफलता के पैमाने पर

सदैव बना रहा फिर भी

अपनों के निशाने पर


न कष्ट किसी को दिया कभी

ना रात गुजारी मैखाने पर

ना छीना निवाला किसी मजलूम का

फिर क्यूँ न उम्र गुज़री ठिकाने पर


छिनता चला गया हर शख्स मुझसे

रूह तक मर चुकी अब उनके जाने पर

मैंने हर रिश्ता निभाया पाक साफ नियत से

फिर क्यूँ हर कोई आया आजमाने पर


कर्म और भाग्य भी विरोधी बने

नींद भी बैठी रहीं सिरहाने पर

देव दृष्टि से भी रहे वंचित सदा

वक़्त भी आमदा रहा सितम ढाने पर


सबकुछ था पर लगता है अब कुछ भी नहीं

मन व्याकुल होता है जश्न मनाने पर

एक दौर था हम भी खुश रहते थे बहुत

अब डर लगता है घर जाने पर ||



Sunday, August 18, 2024

कलयुग मे कृष्ण ना आयेंगे.....



 इस वीभत्स कृत्य का कोई सार नहीं होगा

इससे बुरा शायद कोई व्यवहार नहीं होगा

तुम्हें मौत के घाट उतार दिया कुछ नीच शैतानों ने 

सिर्फ मोमबत्ती जलाने से तेरा उद्धार नहीं होगा |


अब जलाना होगा करके खड़ा उनको चौराहे पे 

जिसने लाकर खड़ा कर दिया इंसानियत को दोराहे पे 

अब धर्म जाति के नाम का कोई हथियार नहीं होगा 

जब जलते देखेंगे तो फिर कभी बलात्कार नहीं होगा |



सिर्फ भाषण से नारी शक्ति का सम्मान नहीं होता 

जो नोच खाए बोटी तलक वो इंसान नहीं होता 

कुछ ऐसा कर दो संशोधन जो बेकार नहीं होगा 

जिससे फिर किसी माँ बाप का आँगन बेजार नहीं होगा |


देवी की उपमा देते है फिर खुद ही दुशासन बन जाते हैं 

चीर हरण के रक्षक जब खुद ही चीर उड़ाते हैं 

ऐसे ही किसी देवी का शायद त्यौहार नहीं होगा 

बेटी! तुम खुद ही शस्त्र संभालो,

इस कलयुग मे कृष्ण का अवतार नहीं होगा

इस कलयुग मे कृष्ण का अवतार नहीं होगा ||

#justiceformoumita



Friday, July 26, 2024

"करगिल से उरी तक: " Hidden Truth"



 

वो युद्ध नहीं था, धोखा था
जो बना था सहोदर, उसी ने छुरा पीठ में घोंपा था।
हमने तो अमन का पैग़ाम भेजा, 
पर उनका कुछ और ही सोचा मंसूबा था।


जिन्हें धड़ काटकर आधा शरीर दिया,
पीने को झेलम-चिनाब का नीर दिया,
भाईचारा जिनसे निभाते रहे,
वही हमें बार-बार ज़ख्म गंभीर दिया।

हम — बुद्ध, श्रीराम के पथिक,
उनके नस्लों में बहता आतंक का रक्त,
हमने चुनी शिक्षा, प्रगति की राहें,
उन्हें तो बस ‘जिहाद’ का था जुनून असक्त।

वो भूले सन् सैंतालीस की जंग,
इकहत्तर की हार की हँसी कहानी,
जुलाई निन्यानवे में फिर हुए अपमानित,
जब कायरता थी उनकी सबसे बड़ी निशानी।

फिर भी ‘पाक’ ज़मीन से,
किए उन्होंने ‘नापाक’ वार बार-बार,
उबरे भी न थे जब 'छब्बीस ग्यारह' से,
'उरी' ने फिर कर दिया दिल तार-तार।

अबकी बार अगर युद्ध हुआ तो,
ना माफ़ी, ना कोई संधि की सौगात होगी,
इस बार न सिर्फ़ POK,
पूरे पाकिस्तान पर कब्जे की बात होगी।

जय हिंद।
जय हिंद की सेना।



Thursday, July 4, 2024

वो वक़्त तो लौटा दो यार...


 तुम रख लो चाहे तोड़ने को दिल

पर नीद तो लौटा दो यार

रख लो मेरी हर एक समझदारी 

पर नादानी को कर दो गुलजार 


मैं कब तक घुट घुट कर इस रिश्ते मे 

अपना सबकुछ जाऊँगा हार 

तुम रख लो अपने सारे सूकून 

पर मेरी बेचैनी तो लौटा दो यार 


हर साँस पे भले जाओ समा 

धड़कन की चाहे रोक दो रफ्तार

तुम रख लो जिस्म का कतरा कतरा 

पर रूह तो लौटा दो यार 

 

और लौटा तो मेरी मुफलिसी 

वो अकेलापन और सपने हजार 

तुम रख लो मेरी एक एक कौडी 

पर वो वक़्त तो लौटा दो यार 


वो वक़्त जो मुझसे छुटा है 

वो नीद जो तुमने लुटा है 

वो शरारत जो थी मेरी हर बात मे 

वो विश्वास जो खुद से टूटा है 


पर लौटाओगे भी तो क्या क्या 

तुमने तो मेरे ख्वाब तक भी छीने हैं 

मुझे कर दिया कंगाल और 

खुद के जूतों पे भी जड़े नगीने हैं 



Wednesday, June 5, 2024

सत्ता सत्य पर भारी....


 देख कर लोकसभा का परिणाम

मन बहुत ही खिन्न हो गया

वो तो संगठित रहे पूरे जुनून से

मगर हिन्दू छिन्न भिन्न हो गया


जो सत्य सनातन का सारथी बना

उसके साथ ही बहुत बड़ा छल हो गया

जिनसे हर हाथ को दिया नयी ताकत

वो ही असहाय और निर्बल हो गया


जिसने प्रभु श्रीराम का मंदिर बनवाया

वह बहुमत भी ना पा पाया

हुए सफल राम का अस्तित्व पूछने वाले

हाय ये कैसा कलयुग आया


हिन्दू अपनी इसी भूल के वजह से

इतिहास मे भी कई बार हारा है

जिसको ये समझ रहे नया सवेरा

ये भूल डुबाने वाली दुबारा है


बहुत दुखी होंगे लखन और हनुमान

मन कुंठित प्रभु श्रीराम का भी होगा

जिन्होंने निर्बल किए है हाथ सनातन के

क्या उनको एहसास अंजाम का भी होगा?


सब भूल गए संदेशखाली और पालघर 

क्या याद नहीं ओवैसी के मंसूबे

तुम एक को हटाने के खातिर 

पूरे राष्ट्र को ही ले डूबे 


बहकावे मे आकर गैरों के 

तुमने ये कैसा कृत्य कर डाला 

सिंचित कर दिया विष व्यापत तनों को 

और खुद के जड़ों को ही जला डाला || 

Written by HARISH 




Saturday, May 11, 2024

सबके पास माँ नहीं होती...


जिसके रूठ जाने से कबूल
मंदिर में पूजा और मस्जिद में अज़ान नहीं होती,
कदर किया करो "दोस्तों"
बेवजह प्यार लुटाने को
सबके पास माँ नहीं होती ||

जब साया हो माँ की ममता का
मुश्किल दौर भी कट जाता है,
तुम्हें खुशियों का जहान देने वाली का
वक़्त चंद लम्हों में सिमट जाता है।
नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमा के
हर दर्द की दास्तां नहीं होती,
कभी तुम भी पूछ लिया करो हाल उसका "दोस्तों"
बेशुमार प्यार लुटाने को
सबके पास माँ नहीं होती ||

जाने का उसका घाव
भगवान भी भर नहीं पाता,
सबसे रिश्ते धूमिल हो जाते हैं
चाहे वो इंसान हो या भाग्य विधाता।
कुनबे को जिसने सींचा, संभाला
उसके बगैर कोई शान नहीं होती,
ध्यान रखा करो "दोस्तों"
अपने हर ग़म को बाँटने के लिए
सबके पास माँ नहीं होती ||

जिसकी मौजूदगी ही घर में
एक नई ऊर्जा का संचार कर देती है,
खुद की झोली खाली हो भले
सबकी खुशियों से भर देती है।
उसका भी कभी हाथ बँटा दो,
मत सोचो उसको थकान नहीं होती,
वक़्त रहते थोड़ा प्यार जता लो "दोस्तों"
प्यार जताने को
सबके पास माँ नहीं होती ||

तुम्हारे दुःख, दर्द, आँसू हरने का
जिसने जिम्मा उठाया है,
रब हर घर की रखवाली कर नहीं सकता
शायद तभी उसने माँ को बनाया है।
कली भी बिन ममता की छाँव
स्वयं जवाँ नहीं होती,
संजो के रखो इन बूढ़ी तरसती आँखों को "दोस्तों"
भूखे पेट भी आशीर्वाद देने को
सबके पास माँ नहीं होती ||
HAPPY MOTHER'S DAY ❤️




Saturday, April 6, 2024

तन खा गई तनख्वाह...



 
तन खा गई तनख्वाह मेरी
वेतन बेवतन कर गई
अस्थायी सी नौकरी मेरी
ना जाने कितने सितम कर गई

समय की परवाह बिना
चाकी सा पिसता रहता हूं
वक्त से तालमेल बिठाने को
बेवक्त घिसता रहता हूं

लहू में भी घुल रहीं
संघर्षों की अदृश्य गोलियाँ
ढल रहा फिरंगी रंग में
भूल गया अपनी भाषा-बोलियाँ

फिर भी कम लगती है उनको
मेरी मेहनत-मजदूरियाँ
सल्फास की गोलियाँ रखी हैं मगर
खाने नहीं देती मजबूरियाँ

नन्ही उम्र में ही छोड़ आए थे
गाँव की चौपाल सब 
अजनबी समझने लगे हैं
अपने ही बाल-गोपाल अब

कमाई ने बस “कम-आय” दी
सपनों पर संकट छा गई
अब किससे जा के कहूँ ‘जनाब’
तनख्वाह मेरी तन खा गई ।




Tuesday, March 5, 2024

अब सीता की बारी है...


 कहाँ त्रेता द्वापर के बंधन मे

बंधने वाली ये नारी है

कल युद्ध लड़ा था श्रीराम ने

अब सीता की बारी है

हर युग मे प्रभु नहीं आयेंगे 

त्रिया स्वाभिमान बचाने को 

बनो सुदृढ़ कर लो बाजुओं को सख्त

तैयार रहो हथियार उठाने को

तुमको ही करनी है फतह 

लंका और कुरुक्षेत्र भी

मौन ही रहने दो बनकर धृतराष्ट्र समाज को

कितने जन्म लेंगे त्रि नेत्र भी

न कोई रावण न कोई दुशासन

टिक पाएगा तेरे प्रहार से

कब तक विनय करके मांगेगी

हक जड़ अधिकाय संसार से

हाथ बढ़े जो चीर हरण को

या सतित्व को ठेस पहुंचाने को

बन काली भर अग्नि हुंकार

रक्त रंजित नेत्र काफी है भू पटल हिलाने को



Wednesday, February 21, 2024

पर चूहे से भी डरती है..


हवा से दोस्ती है उसकी,
कलियों से गुफ़्तगू करती है,
शेरनी-सी छवि समेटे हुए,
पर चूहे से भी डरती है।

वाचाल है—सब कह जाती है,
बातें मन में टिकती कहाँ,
खुद ही अपनी खिल्ली उड़ाती,
और हँसती जी भर यहाँ।

अभी तो दुनिया देखी भर है,
फिर भी अनुभव गहरा-तमाम,
कर्मों में लगभग परिपूर्ण,
बातों से लगती है नादान।

भीड़ भरे इस समाज में वो
अपना वजूद बचाती है,
रिवाज़ों के भारी पत्थर से
हर रोज़ खुद को उठाती है।

नाज़ुक-सी है, पर भीतर से
लोहा बनकर जीती है,
टूटे ख्वाबों की किरचों से
फिर अपनी राहें सीती है।

उसकी हँसी में सुकून भी है,
और एक खामोश सवाल भी—
क्यों हर लड़की के हिस्से में
आता है इतना जंजाल भी?

फिर भी हर सुबह उठकर वो
उम्मीद की लौ जलाती है,
अपने छोटे-से आँगन में
पूरा आसमाँ सजाती है।

जुड़ रहा जीवन में उसके,
है एक नया अध्याय आज,
परेशानी में भी हँसा दे सबको,
वो खुशियों की सजीव आवाज़।

दुआ है बस इतना रब से—
उसकी राहें आसान रहें,
वो जैसी है, वैसी ही रहकर
हर दिल की पहचान रहें।

खुशियाँ मिलें उसे अपार,
घर-आँगन में उजियाली हो,
सपने सारे सच हो जाएँ,
वो परिवार की अंशुमाली हो।

 



Sunday, January 14, 2024

हुताशन के हवाले अरण्य..


               करके हुताशन के हवाले अरण्य को

निर्झरणी के तलाश मे जाता मनुज है

पवन जलधर को कर वेग प्रवाहित

उम्मीद की रश्मि को अम्बर ले जाता है


वसुधा तरस रहीं सलिल बिन

पुरंदर से लगाए आस है मधुपति भी

वाटिका, सरोज, प्रसून और तरिणी

चक्षु जोह रहे हैं पयोधर के


अंबिका को ही बनकर भुजंग

नर अनल के विशिख छोड़ रहा

महि चपला सी चंचलित होकर

सारे सब्र के बाँध को तोड़ रहीं


प्रलय को जन्म दे रहे फिर

देवनदी, कालिंदी, सरिता और रत्नाकर

भयभीत सभी हैं आभास से विनाश के

थर थर काँप रहे हैं अडिग भूधर


नतमस्तक होकर साष्टांग दण्डवत

कर जोड़े ग़र याचक बनकर

अब भी तरु अंकुरित हो सकते हैं

भव सब विष हर लेंगे फिर से रक्षक बनकर ||