अब रोज़ तुझसे गुफ़्तगू कहाँ मयस्सर होती है,
मगर हर साँस में तेरी ही ख़बर होती है।
सच कहूँ, दिन तो किसी तरह गुज़र जाता है,
रात की हर चुप्पी तेरे नाम बसर होती है।
ख़ुदा तुझे हर ग़म की हवा से बचाए रखे,
यहाँ अपनों की नज़र भी अक्सर ख़ंजर होती है।
मैं मुस्कुरा भी दूँ तो लोग वजह पूछते हैं,
किसे बताएँ कि दिल में कैसी हज़र होती है।
(हज़र = डर)
वो तेरी हँसी… जैसे सूखे लबों पर बारिश,
वो तेरी बात… जैसे रूह पर असर होती है।
तू महफ़िल में रहे तो रौशनी उतर आए,
तेरे बिन हर बस्ती भी वीरान शहर होती है।
तेरी ख़ामोशी भी अल्फ़ाज़ से भारी लगती,
कभी समंदर, कभी डूबती लहर होती है।
मीलों फ़ासलों में भी तू दिल से दूर नहीं,
कुछ मोहब्बतें जिस्म नहीं, रूह का सफ़र होती हैं।
वक़्त की धूल ने बहुत कुछ ढक लिया लेकिन,
तेरी याद अब भी दिल में चिराग़-ए-सहर होती है।
मैं हर दुआ में तेरा नाम यूँ रखता हूँ,
जैसे सजदे में कोई आख़िरी आस ठहर होती है।
अगर कभी तेरी आँखों में उदासी उतर आए,
समझना मेरी दुआओं में कहीं कसर होती है।
शिकवा तो नहीं इन फ़ासलों से अब मुझको,
बस तेरे ठीक होने की तलब उम्रभर होती है।
कभी जो थक के बैठ जाए तेरी मुस्कुराती रूह,
मेरी याद भी शायद तेरे पास हमसफ़र होती है।
कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी अधूरे रहते हैं,
और कुछ अधूरे होकर भी ताउम्र असर होती है।
सच कहूँ, तेरे बाद भी ज़िंदगी चल तो रही है,
मगर हर धड़कन में एक ख़ाली सी लहर होती है।
तू मिले न मिले, ये मुक़द्दर की बात सही,
मोहब्बत तो वही है जो दुआ बनकर अमर होती है।
Tuesday, April 21, 2026
फासलों के उस पार....
Tuesday, April 14, 2026
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में… (एक अधूरी आवाज़ की पूरी कहानी)
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
जहाँ रिश्ते कागज़ पर तय होते हैं,
और दिलों की धड़कनें
चुपचाप समझौते ढोती हैं।
मैं वही लड़की हूँ…
जिसे वक़्त ने सवाल बनाकर छोड़ दिया,
जिसकी हँसी को धोखे ने
धीरे-धीरे खामोश कर दिया।
कहते हैं — “बेटी, अब भूल जाओ…”
पर क्या टूटे भरोसे भी
इतनी आसानी से जुड़ जाते हैं?
क्या आँखों में जमे हुए डर
बस रस्मों से धुल जाते हैं?
कम सुनाई देता है मुझे…
हाँ, ये दुनियाँ के शोर शराबे....
पर मैं हर वो चीख़ सुनती हूँ
जो मेरे भीतर रोज़ मरती है।
हर वो सिसकी महसूस करती हूँ
जो मेरी चुप्पी में पलती है।
तुम्हारे रीति-रिवाज़
मेरे घावों पर मरहम नहीं,
बल्कि नमक बनकर गिरते हैं,
जहाँ “समाज” की इज़्ज़त के नाम पर
मेरे सपने हर रोज़ मरते हैं।
मैं नहीं बढ़ूँगी उस राह पर
जहाँ मेरी आवाज़ को
“लड़की की ज़िद” कहकर दबा दिया जाए,
जहाँ मेरा डर भी
“समझदारी” में बदल दिया जाए।
मैं थकी हूँ…
पर टूटी नहीं हूँ अभी,
मैं चुप हूँ…
पर झुकी नहीं हूँ अभी।
मेरे कान भले अनसुना कर दे,
पर मेरी रूह अब साफ़ सुनती है—
मेरे खिलाफ रची गई हर साजिश को..
इसलिए मैं कहती हूँ—
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
मैं अपने टूटे हिस्सों को
खुद ही जोड़ लूँगी,
पर किसी और के नाम पर
खुद को फिर से नहीं तोड़ूँगी।
Tuesday, March 31, 2026
वो खामोश है बेपरवाह नहीं....
Friday, March 20, 2026
शक्ति का प्रचंड स्वर : जय माँ दुर्गा
जगजननी के चरणों में दीपक की लौ जलती है,
सिंहवाहिनी के रूप में शक्ति स्वयं चलती है।
भारतीय संस्कृति की धारा माँ के वंदन में बहती है,
जय श्री दुर्गा की जयकार से सम्पूर्ण सृष्टि संभलती है।
शंख बजें, मंदिर गूँजें, हर आँगन मंगलमय हो,
जप-तप और साधना से जीवन सदैव दैवमय हो।
हिन्दुत्व की आत्मा गाती — धर्म रहे, संस्कार रहें,
माँ दुर्गा के आशीर्वाद से सब दुःख मिटें, न कोई भय हो।
ढोल-नगाड़े गगन गूँजें, हर दिशा में मधुर तान बहे,
आरती की थाल सजे, भक्ति-सागर समान बहे।
सनातन की पहचान है माँ के चरणों में समर्पण,
सदियों से जो संस्कृति है, वही जीवन का ध्यान रहे।
सिंह-गर्जना सी शक्ति से जब माँ का आशीष मिले,
असुरों के पाप धधक उठें, धर्म की रक्षा फलित चले।
आस्था की ज्योति जलती रहे हर दीपक की लौ में,
हर मंदिर, हर आँगन में माँ दुर्गा स्वयं संग चले।
माँ का व्रत है साधना, माँ का स्मरण है प्राण,
माँ का ही रूप है भारत, माँ का ही है सम्मान।
सहस्रों वर्षों की गाथा से देवी-शक्ति का परचम लहराए,
जय श्री दुर्गा के उद्घोष से गूँजे हर स्थान।
जयकारा उठे गगन में, दीपक हर द्वार में जलें,
नवरात्रि के नौ दिन माँ के आशीष सदा फलें।
भक्ति की ज्योति प्रज्वलित रहे, हर मनुज के हृदय में,
जय माँ दुर्गा की जयकार से कभी न श्रद्धा का सूर्य ढले।
Saturday, February 21, 2026
जागीर-ए-अश्क...
आँसू वासू रोना-धोना, सब तेरे खातिर तो है,
ये आँखें भी मानो तेरी, गिरवी रखी जागीर तो हैं।
तू दिखे चाँद-सा निर्मल, आग सी मिलती ताहिर तो है
तू लगता शरीफ लाख भले, दिमाग तेरा शातिर तो है।
तेरे लफ़्ज़ भले चाशनी से हों, घाव करे तो तीर से है
हर खेल मे पहली चाल तेरी, फिर हारना तो तकदीर से है ।
तू मासूम भी, तू ही कातिल भी, हीरे सी तेरी तासीर तो है
मेरे आँसू समंदर नहीं, पर सबसे क़ीमती नीर तो है ।
तू पास नहीं एहसास है मुझे, पर प्यार जताने को तस्वीर तो है
मैं रोऊँ तो बदरी छाए, दिल मे अब भी कोई पीर तो है
यहाँ रांझा बदल गया बेमतलब, पर बाट जोहती हीर तो है।
तेरे नाम की तस्बीह फेरते-फेरते , रूह आज भी शब्बीर तो है ।
सांसो में ताले पड़ गए, मन अब भी बड़ा अधीर तो है
शोहरत लाख बक्शी हो खुदा ने, दिल से तू फकीर तो है ।
एक दिन टूट जाएगा ये रिश्ता भी, सिर्फ माया का जंजीर तो है
मैं हार के भी तुझे जीत कहूँ, अब भी खुदा मेरा नासीर तो है ।
जागीर = 'संपत्ति' या 'रियासत'
ताहिर = 'पवित्र' या 'शुद्ध'
तासीर = 'प्रभाव' या 'असर
पीर = दर्द या वेदना:
शब्बीर = 'सुंदर', 'उत्तम चरित्र वाला' या 'नेक'
अधीर = 'धैर्यहीन' या 'बेचैन'
नासीर = 'मददगार' या 'सहायता करने वाला' |
Wednesday, December 31, 2025
अलविदा 2K25...
जा रहा है 2025
पीछे छोड़कर कुछ अधूरे ख़्वाब,
कुछ पूरे हुए वादे,
और ढेरों सबक—
जो वक़्त ने
ख़ामोशी से हथेली पर रख दिए।
इस साल ने
कभी हँसना सिखाया,
कभी आँसुओं से आँखें भर दीं,
कभी अपनों की अहमियत समझाई,
तो कभी भीड़ में
अकेले खड़े रहना।
अब दरवाज़े पर दस्तक हुयी है
2026 की—
नई धूप, नई राहें,
नए इरादों के साथ।
स्वागत है उस साल का
जो टूटे हौसलों को जोड़ दे,
थके क़दमों को
फिर चलना सिखा दे।
अलविदा 2025,
शुक्रिया हर दर्द, हर दुआ के लिए—
तूने जो छीना,
उससे ज़्यादा
हमें मज़बूत बनाकर दिया।
सुस्वागत 2026,
इतना सा वादा कर लेना—
कि इंसानियत ज़िंदा रहे,
सच की आवाज़ कमज़ोर न पड़े,
और मेहनत करने वाले हाथ
कभी खाली न लौटें।
एक नया सवेरा है,
एक नई उम्मीद के नाम—
स्वागत है 2026,
दिल खोलकर, पूरे सम्मान के साथ।
Happy New Year to All Of You.
Tuesday, December 23, 2025
कदर....
जब बंदर के हाथ लग जाए हल्दी,
या किसी को सबकुछ मिल जाए जल्दी—
तब कदर नहीं होती वक़्त की,
या घमंड कर देता चकनाचूर है।
यहाँ कोई हालातों का मारा,
तो कोई जीता जीवन भरपूर है।
जब अंधे के हाथ लग जाए बटेर,
या भिखारी के हाथ लग जाय धन का ढेर—
तब कदर नहीं होती मेहनत की,
समय भी खो देता अपना नूर है।
यहाँ कोई पानी-सा शीतल रहता,
किसी में आग-सा धधकता गुरूर है।
जब पूस की सर्दी में मिल जाए अलाव,
या बूढ़े जिस्म मे आ जाए ताव—
तब कदर नहीं रहती दाता की,
हर उम्र में इंसान कहीं न कहीं मगरूर है।
यहाँ कोई गैरों से भी होता बेहद करीब,
तो कोई अपनों से भी बहुत दूर है।
जब रणभूमि में मिल जाए संजीवनी,
या तरक्की हो दिन-दूनी रात-चौगुनी—
तब कदर नहीं रहती दवा और दुआ की,
जिंदगी में ऐसा समय भी आता ज़रूर है।
यहाँ कोई सोता शीशमहल के मखमली बिस्तर पर,
तो कोई रातों को जागने को भी मजबूर है।
जब प्यासे को मिल जाए दरिया का किनारा,
या किसी भटके राही को मिल जाए सहारा—
तब कदर नहीं रहती राहों की,
न मंज़िल का रहता कोई सुरूर है।
यहाँ कोई टूटकर भी मुस्कुराता रहता उम्रभर,
कोई सब पाकर भी भीतर से बिल्कुल चूर है।
जब खुशियाँ किसी के दामन में भर जाएँ पूरी,
या किसी के हिस्से आए बस तन्हाई और दूरी—
तब कदर नहीं होती सुकून की,
और हर ज़ख्म होता तब नासूर है।
यहाँ कोई अँधेरों में भी ढूंढ लेता है राह अपनी,
कोई रोशनी में रहकर भी बेनूर है।|
Friday, December 5, 2025
उजड़ा आशियाना ( प्रकृति की मार)
मलबे के ढेर पर बैठा, वो अपना सब कुछ खोकर,
छिपा लिया है चेहरा हाथों में, शायद जी भर रोकर।
कल तक जो एक हँसता-खेलता घर था,
आज वो बस टूटी लकड़ियों और कीचड़ का मंज़र था।
तिनका-तिनका जोड़कर, उम्र भर जो गृहस्थी सजाई थी,
कुदरत के एक कहर ने, पल भर में सब मिटाई थी।
जिन दीवारों में गूँजती थी कभी अपनों की किलकारी,
वहाँ आज पसरी है बस ख़ामोशी और लाचारी।
मिट्टी में सने वो हाथ, जो कभी मेहनत से ना थकते थे,
आज अपनी ही बर्बादी के टुकड़े समेटने को तरसते थे।
आँखों से बहते आँसू, अब सूखकर पत्थर हो गए,
सपने जो देखे थे कल, वो इस सैलाब में कहीं खो गए।
सामने लगा ‘राहत शिविर’ का बोर्ड उसे चिढ़ाता है,
अपने ही घर का राजा, आज भिखारी नज़र आता है।
यह सिर्फ मकान नहीं टूटा, एक इंसान का हौसला टूटा है,
कुदरत, तेरे खेल ने आज फिर एक गरीब का घर लूटा है।
Friday, November 28, 2025
मरने से पहले...
कुछ समेट लूँ पंक्तियों में, अल्फ़ाज़ बिखरने से पहले,
क्या दो-चार दिन जी लूँ मैं भी, यूँ ही मरने से पहले।
मेरी तो रूह तलक काँप जाती है, किसी और को सोच के भी,
क्या उसके कदम नहीं डगमगाए होंगे, दग़ा करने से पहले।
अब किससे कहूँ — इन ज़ख़्मों को रफ़ू कर दे लफ़्ज़ों से,
मैं दर्द की हर इन्तहा देखना चाहता हूँ, हद से गुज़रने से पहले।
अब धीरे-धीरे साँसें भी भरने लगी हैं ज़हर मुझमें,
मैं सब कुछ समेटना चाहता हूँ, फिर से बिखरने से पहले।
तुम यक़ीन करो या ना करो मेरी हाल-ए-दिली दास्तानों पर,
मैं सब कुछ उड़ेलना चाहता हूँ, बेख़ौफ़ भरने से पहले।
एक रोज़ आएगा, तुम भी तड़पोगे किसी अज़ीज़ के लिए,
तब समझोगे, क्या होता है — हज़ार बार मरना, मरने से पहले।
आज मैं हूँ, तो सब कुछ मेरी ही ग़लती लगती होगी तुम्हें,
कभी मेरी हालत देखी थी तुमने — यूँ सँवरने से पहले?
ये बिखरे ख़्वाब, ये गलीच लहजा, सब तेरी इनायत हैं,
मेरा दिल भी पाक-साफ़ था, तेरे दिल में ठहरने से पहले।
अब और लिखूँगा तो कलम भी रो पड़ेगी मेरे हालात पर,
तेरा एक आँसू तक ना गिरा — मेरी ख़ुशियाँ हरने से पहले।
दो-चार दिन और दिखेगी मेरी सूरत तेरे मोहल्ले में,
मैं बस एक बार जी भर के देखना चाहता हूँ — तुझे, बिछड़ने से पहले। 🌙
Saturday, November 15, 2025
“रघुवंश की मर्यादा की कथा”
जय श्रीराम 🙏
Sunday, November 2, 2025
मन मार रहा हूँ मैं
ऐसा भी नहीं कि हार रहा हूँ मैं,
मगर धीरे-धीरे ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं।
बहुत कुछ देख लिया इन चार दिनों की उम्र में,
लगता है पिछले जन्मों का गुनाह उतार रहा हूँ मैं।
कितने ख्वाब, कितनी ख्वाहिशें समेटे था मन,
मगर अब बैरागी बन वक़्त गुज़ार रहा हूँ मैं।
किससे कहूँ — लौटा दे वो पुराने दिन,
जिनके लिए अब रोज़ बचपन को पुकार रहा हूँ मैं।
अब मन से भी चीज़ें बेमन सी हो जाती हैं,
बस पग गिन-गिन कर सफ़र कर पार रहा हूँ मैं।
इतना ऊब गया हूँ अब ज़िंदगी के ऊहापोह से,
शांति की ख़ातिर ख़ुद को न्यौछार रहा हूँ मैं।
बहुत किया प्रयत्न, पर परिणाम हमेशा खिलाफ ही रहा,
समझ नहीं आता कौन-सा कर्ज़ तार रहा हूँ मैं।
कुछ तो मैंने भी झेला होगा बहुत बोझिल मन से,
ऐसे ही नहीं, ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं। 🙏
Wednesday, October 22, 2025
“वो जो गुनहगार नहीं थी — एक जिंदा लाश की दास्तान”
धीरे-धीरे ज़िंदगी से बाज़ी हारी जा रही है,
अश्क़ों को आँखों में लिए, वो बेचारी जा रही है।
पहले नोचा जिस्म, फिर दिल के भी टुकड़े कर दिए,
मौत से बदतर अब वो, ज़िंदगी गुज़ारी जा रही है।
ऐसा क्या गुनाह किया कि, साँस भी रुकती नहीं,
मृत्यु भी उसको बस, दूर से निहारी जा रही है।
मुफ़लिसी थी वजह या, प्रेम करना महँगा पड़ा,
सरेआम ही उसकी अब, इज़्ज़त उतारी जा रही है।
नादानी में जो हुआ, उससे बस इतना गुनाह,
जिस्म तुझको सौंप दिया, रूह भटकती जा रही है।
पेट में जो पल रहा है, दोनों की नादानी का फल है
फिर अकेले ही वो क्यूँ, कुलटा पुकारी जा रही है?
तुम ही हो उसके, बहते ख़ून के ज़िम्मेदार,
फिर क्यों अकेली उसको, ये बीमारी खा रही है?
मानो या न मानो, ज़मीर कोसता तो होगा ही,
देख, ग़लतियों की एक, जिंदा लाश तुम्हारी जा रही है।
गुनाह तेरे थे और, गुनहगार उसको ठहरा दिया,
अब दर्द सहने की वही, तेरी बारी आ रही है।
उसका रोना और, मायूसी भरे हर लम्हा
देख लौटकर अब, हिसाब लेने सारी आ रही है
उजाड़ा था फूल किसी, लाचार बाप के आँगन का,
आज अपनी बेटी के लिए, बगिया सँवारी जा रही है।
कर्म है लौटकर आता है, यक़ीनन,
देख खून मे लथपथ, बेटी तुम्हारी आ रही है।|
Wednesday, October 15, 2025
जिंदगी :- एक अजीब सी किताब
ज़िंदगी, तू अजीब सी किताब है,
कभी आँसू, कभी हँसी का सैलाब है।
कभी धूप में जलती उम्मीदों का सागर,
कभी छाँव में ठहरी कोई ख़्वाब-सा गुलाब है।
तेरे हर पन्ने पे कुछ लिखा सा लगता है,
कहीं अधूरा, कहीं मुकम्मल जहान टिका सा लगता है।
कभी ठोकरें देती है रास्तों पे चलने को,
कभी हाथ पकड़ कर सहारा देती है संभलने को।
कभी तू शिकवा बनकर छलकती है आँखों से,
कभी दुआ बनकर ठहर जाती है होंठों पे।
कभी खामोशियों में भी बोल उठती है,
कभी भीड़ में भी तन्हाई का एहसास दिलाती है।
ज़िंदगी, तू सिखाती है —
हार में भी जीत की एक लकीर होती है,
हर अँधेरे के पीछे सुबह की ताबीर होती है।
गिरना भी मंज़िल का ही एक हिस्सा है,
सफलता के पीछे इंसान की तक़दीर होती है।
कभी दर्द, कभी गीत,
कभी मुस्कान, कभी प्रीत —
ज़िंदगी तू ना जाने कैसी पहेली है,
किसी के लिए सख्त प्रशिक्षक, किसी के लिए सहेली है।
Sunday, October 5, 2025
इकरार के आगे.....
दुनिया में बहुत कुछ है प्यार के आगे
सिर्फ मौत ही हल नहीं इंकार के आगे
पलकों पे सजाए रखें हैं तस्वीर तेरी लोग
लेकिन धुँधला पड़ जाता है दीदार के आगे
तेरी महफ़िल में बैठे ही जाँ देकर उठे
हम बचे कैसे रहते तेरे असरार के आगे
ग़म की सौग़ात लिए घूमे हैं सहरा-सहरा
दिल नहीं टिकता किसी भी गुलज़ार के आगे
तेरी आँखों का जादू है कि जंजीर का बोझ
क़ैद हो जाता है इंसाँ भी पहरेदार के आगे
जिस्म चाहे थक गया हो सफ़र की मुश्किल से
रूह रुक नहीं सकती अब मझधार के आगे
शबनमी ख्वाब सजे हैं तेरी पलकों के तले
चाँद भी सर झुकाता है रुख़सार के आगे
ख़ौफ़-ए-तन्हाई से डरता नहीं "हैरी" अब तो
रब की रहमत ही काफ़ी है ग़मगार के आगे
अब "स्याही" भी खामोश नहीं रह सकती दोस्त,
लफ़्ज़ सिर झुका देते हैं इकरार के आगे।
Thursday, September 25, 2025
बंद कमरों की सिसकियाँ...
चुप्पियों के पीछे पुकारें बहुत हैं।
हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे जो छिपा है,
उस दर्द के समंदर के किनारे बहुत हैं।
घर है ये या कोई सज़ा की कोठरी?
यहाँ रिश्तों की बोली को बेगारे बहुत है।
जहाँ हर थप्पड़ के बाद यही सुनाई देता है —
"सिसकियाँ बंद करो वर्ना विकल्प तुम्हारे बहुत है "
कहीं माँ का आँचल जलती सिगरेट से जली,
कहीं डरे सहमे पुरुष बेचारे बहुत हैं ।
जिसको जैसे ढाला समाज ने वैसे ही ढल गए
क्योंकि ढोंगी समाज सुधारक हमारे बहुत हैं
रात की ख़ामोशी में चीख़ गूंजती है,
अब भी खण्डहर मकानों की दीवारें बहुत हैं ।
अंदरुनी बाते हवा से भी तेज फैल जाती है बाजारो मे
प्लास्टर वाले घरों मे भी दरारे बहुत हैं ।
दर्द अब लिपस्टिक के नीचे छुपा रहता है,
मगर आँखों मे बेबसी के नजारे बहुत है।
तहज़ीब सिखाई जाती है बेटियों को ही बस
"खुले सांड से घूम रहे बेटे प्यारे बहुत हैं "
पर रिश्तों की आड़ में ज़ुल्म सह कर
कुछ लोग जिंदगी से हारे बहुत हैं ,
और समाज “मामला व्यक्तिगत” बताकर चुप रहता है
ये मीठा बोलने वाले लोग खारे बहुत हैं
अब वक़्त है इन बंद कमरों की साँकलें तोड़ने का,
हर खामोशी को आवाज़ देने को मीनारें बहुत है
मिलेगा न्याय और अधिकार हर मजलूम को, यहाँ
दृढ़ और सशक्त अब भी दरबारें बहुत हैं ||
Tuesday, September 16, 2025
“एक राष्ट्र, अनगिनत राग”
बर्फ़ की चादर में डल झील की तासीर।
हिमाचल की घाटियों में देवता उतरते हैं,
उत्तराखंड की नदियों में खुद शिव जल भरते हैं।
पंजाब की सरसों गाती है वीरों का गान,
हरियाणा की मिट्टी है मेहनत की शान।
गंगा-यमुना का मिलन से बनाता यू. पी. महान,
बिहार के गया व नालंदा ने दिया विश्व को ज्ञान।
लाल क़िले से गूँजती है स्वतंत्रता की शपथ,
क़ुतुब से संसद तक गढ़ा है लोकतंत्र का पथ ।
गंगा-जमुनी तहज़ीब की पनाह मे सबका एक मत,
दिल्ली है दिल, जहाँ से धड़कता है पूरा भारत।
झारखंड के जंगलों में ढोल की थाप,
छत्तीसगढ़ की धरती पर जनजातियों का आलाप।
ओडिशा की रथयात्रा खींचती है श्रद्धा की डोर,
बंगाल की हवा में अब भी साहित्य का शोर।
सिक्किम के फूलों से खुसबू हर पल,
अरुणाचल है भारत का सूर्योदय स्थल।
आसाम की चाय से महकती हर टपरी,
मेघालय के बादलों में दिखती है बेफिक्री।
नगालैंड के पर्व और रंग बिरंगे परिधान
मणिपुर का नृत्य और खेल भारत के शान।
मिज़ोरम की पहाड़ियों से झरनों का गीत,
त्रिपुरा की गलियों में इतिहास का मीत।
गुजरात का गरबा और गिर के शेर
राजस्थान मे ही है "भारत का मक्का" अजमेर ।
महाराष्ट्र की धड़कन है छत्रपती शिवाजी महान,
गोवा 'स्वतंत्रता-संग्राम' की अंतिम जीत की पहचान |
कर्नाटक की वीणा में गूंजते है प्राचीन राग,
केरल की नावों संग बहता शीतल बैराग।
तमिलनाडु में प्राचीन मंदिर और दक्खिन का पठार
आंध्र-तेलंगाना में प्रसिद्ध बालाजी और चारमीनार।
अंडमान-निकोबार दिखलाती स्वतंत्रता का समर्पण,
लक्षद्वीप के नीले पानी में झलकता है ईश्वर का दर्पण।
'लौहपुरुष' ने सब रियासतों को मिलाकर किया कार्य नेक
"अब राज्य तमाम है, मगर भारत सबकी आत्मा एक"
Sunday, September 7, 2025
CPR दे रहे हैं....
Sunday, August 31, 2025
सर्वधर्म समभाव...
Monday, August 25, 2025
अँधेरे के सौदागर
ऐ मुन्शी, जाकर कह दो ठेकेदार से,
क्यों सघन अंधेरा छाया है बस्ती में?
क्यों लोग आतुर हैं, खाने को अपनों को ही,
क्या सच में बदल गई है दुनिया नरभक्षी में?
उसी के हिस्से आया था ठेका शायद —
हर कोना शहर का रोशन करने का,
फिर क्यों बुझा दिए लालटेन हर घर के?
नहीं सोचा अंजाम, बूढ़ी आँखों को नम करने का?
ऐ ठेकेदार! मत भर झोली इतनी,
कि बोझ तले तू खुद ही दब जाए।
मुन्शी कहीं तेरा ही बनकर विभीषण,
तेरी काली कमाई को न उजागर कर जाए।
तू सिर्फ धर्म का ठेकेदार है, या
मंदिर-मस्जिद पे भी बोली लगाता है?
या फिर धर्म की इस बँटी बस्ती में
सिर्फ खून की होली मनाता है?
कौन जाति-धर्म का बना है रक्षक तू?
किसने ठेका दिया है आवंटन का?
कैसे भर देता है नफरत रगों में —
क्या तनिक भी खौफ नहीं तुझे भगवन का?
जिसके इशारों पे चलती है कायनात,
उसी को बांटने का तूने काम ले लिया!
अपने फायदे को झोंक दिया पूरा शहर,
और नारों में उसका नाम ले लिया!
अब बंद कर ये धर्म की दलाली,
इस देश को चैन की साँस लेने दे।
मत बरगला युवाओं को झूठे नारों से —
इस बेवजह की क्रांति को अब रहने दे।
जला कर बस्तियाँ रोशनी का ठेका लिया है,
कब तक कफन का सौदा करेगा?
इंसान के कानून से तू बेखौफ है,
क्या दोज़ख की आग से भी न डरेगा?
चल, अब अमन का सौदा कर,
शांति का बन जा तू सौदागर।
विश्व बंधुत्व के जुगनुओं से,
हर घर में फिर उजाला कर
हर घर मे फिर उजाला कर ||
Tuesday, August 19, 2025
कहाँ गए वो दिन?
कब तलक मन को समझाएँ,
अब कहाँ वो बात रही।
ना छाँव शिवालयी बरगद की,
ना रिश्तों की सौगात रही।
अंतर्देशी पर चिट्ठी ना आती,
बस मोबाइल की टन-टन है।
बातों में अब रस न बचा,
सब दिखावा, सब बेमन है।
गाँव के हाट-बाज़ार बिसरे,
मंडी अब मॉल बन गई।
गुड़ की मिठास ढूँढे को तरसे,
रिश्तों की हँसी मखौल बन गई।
कंधे पे चढ़ तारे देखते थे,
अब स्क्रीन में दिन-रात ढले।
खेल-खिलौना भूल गए बालक,
फोन की गिरफ्त में हर पल रहे।
ना चौपाल, ना बिरादरी बैठकी,
बस सोशल मीडिया की है मंडी।
मन कहे “चल जी ले थोड़ी देर”,
पर लाइक-कमेंट ही बन गई ज़िंदगी।
कहाँ गए वो धूल-धक्कड़ दिन,
जहाँ हर जख्म में माटी थी।
अब तो हर दर्द मे अस्पताल पहुचते,
पहले दादी ही मरहम लगाती थी।
उम्र बढ़ी तो ख्वाहिशें सिकुड़ीं,
जिम्मेदारी भारी, खुशियाँ भी बिखरीं।
रिश्ते छूटे, नाते बिसरे,
जीने की चाह भी धीरे-धीरे मुरझा सी गई।
फिर भी उम्मीद का दीप जलाए,
मन कहता है—“वो दिन लौटेंगे कभी।”
जहाँ मेल-जोल ही दौलत होगा,
और रिश्ते की अहमियत समझेंगे सभी।।
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मैं कब कहाँ क्या लिख दूँ इस बात से खुद भी बेजार हूँ मैं किसी के लिए बेशकीमती किसी के लिए बेकार हूँ समझ सका जो अब तक मुझको कायल मेरी छवि का...
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मैं मिलावटी रिश्तों का धंधा नहीं करता बेवजह किसी को शर्मिदा नहीं करता मैं भलीभाँति वाकिफ हूँ अपने कर्मों से तभी गंगा मे उतर कर उसे गंदा...




























